काम की बात “विजय के. वर्मा” प्रिय मित्रों, प्रेम… “सहयोग की महिमा”

“सहयोग” की महिमा बड़ी निराली है मित्रों। परम पिता परमेश्वर की कृपा रूपी आशीर्वाद और माता-पिता के सहयोग से हम इस धरती माता पर आए। दो आत्माओं के सहयोग से एक होकर जीवन का सृजन होता है। है ना चमत्कार? आज के विज्ञान और गणित से परे, जहाँ 1+1 बराबर 2 नहीं, बल्कि एक ही हो जाता है एकाकार। हम उसी एकाकार स्वरूप का साकार रूप हैं। यदि यह सोच हम सबकी हो जाए तो यह दुनिया स्वर्ग से कम नहीं होगी, और यह सभी के सहयोग से ही संभव है। यही सत्य है और यही सोच आज के विश्व युद्ध जैसे माहौल रूपी महाभारत में देशों की सीमाओं रूपी जंजीरों को तोड़कर “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को साकार कर सकती है। “मानव”, जो माँ का ही नया रूप है, को साकार करने में सभी के सहयोग से एक बार फिर इस कलयुग में सम्पूर्ण रामायण रचेगी—आज नहीं तो कल। इसमें चिंता की क्या बात है? यह भी एक काम की बात है।
राजनीति का अंतिम पड़ाव राजनीति ही है—यही सत्य है। यहाँ हम उस राम की बात कर रहे हैं जो हमारे रोम-रोम में, हर प्राणी मात्र में विद्यमान हैं। रामजी को अयोध्या की सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता, मित्रों। यही सोच हमारे “वसुधैव कुटुम्बकम्” को साकार कर पूरी दुनिया को एक करने में मदद करेगी। जाने वाले इस कलयुग में यह भी एक काम की बात है। यही तो राम की बात है मित्रों।
भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में धनंजय अर्जुन को कर्म की रीत का जो संदेश दिया था, वह मानव जाति के लिए सदा-सर्वदा मार्गदर्शक है। वर्तमान विश्व युद्ध जैसे माहौल में भी वह सारी दुनिया में शांति की स्थापना के मार्ग में मील का पत्थर साबित हो रहा है। वह हमें बताता है कि पूरी दुनिया को “वसुधैव कुटुम्बकम्” बनाने से हम अभी बहुत दूर हैं। सन् 2047 से आने वाले वर्षों में भारत में और कौन-कौन से अजीबो-गरीब नेता आएँगे, यह भविष्य के गर्भ में छिपा है। परमपिता की कृपा से वही नेता सारी दुनिया को प्रेम और शांति का नगर बनाने में “सहयोग” करेंगे।
कर्म और वचन की रीत तो रघुकुल के जमाने से चली आ रही है, जिस पर चलकर राजकुमार श्रीराम वन जाते हैं और वनवास काटकर भगवान राम बनकर अपनी जन्मभूमि अयोध्या लौटते हैं। यहाँ याद रखने की “काम की बात” सिर्फ इतनी सी है कि “प्राण जाए पर वचन न जाए।” इसलिए जनता जनार्दन को वचन दो तो पूरा करो, नहीं तो सिंहासन खाली करो।
सिंहासन की रक्षा हेतु वनों और जंगलों में भी जाना होगा। उन लोगों के दुख-दर्द को महसूस करते ही आप सच्चे देशभक्त बन सकते हैं, जिन्हें आज भी यह मालूम नहीं कि 15 अगस्त और 26 जनवरी क्या हैं, क्योंकि वे कभी-कभी भूखे ही सो जाते हैं। इस उम्मीद में कि कोई तो आएगा जो सच्चा वचन निभाएगा, जो उनके वोटदान को वरदान समझकर अपना फर्ज निभाएगा। यह भी एक काम की बात है, जिस पर काम होना चाहिए।
अपने शहर की सीमा से तीस-चालीस किलोमीटर दूर जंगल में जाकर हर देशभक्त को, गरीबों और आदिवासियों के मसीहा बनने का दावा करने वाले माननीय साथियों को भारत माता के उन भूखे-गरीब लोगों के पास जाकर अपना फर्ज निभाना चाहिए। उनके दुख-दर्द से जुड़ना चाहिए। हफ्ते-पंद्रह दिन में न सही, चार-छह महीने में एक-दो बार ही सही। क्योंकि उनके वोटदान से ही हम हवाई जहाज में उड़ते हैं। यदि हम अपने फर्ज का कर्ज चुकाने से चूक रहे हैं, तो उसका परिणाम हमें ही भविष्य में भुगतना होगा।
शहरों की गंदी बस्तियों और झुग्गी-झोपड़ियों में जाकर भोजन कर फोटो खिंचवा लेना कोई बड़ी बात नहीं है। यदि आप सच में दिल से गरीबों से जुड़े हैं तो शबरी माता के जूठे बेर प्रेम से जंगल में जाकर खाइए। राम बनने से किसने रोका है आपको? रामजी भी ऐसे कार्य से प्रसन्न होंगे। मुफ्त में रामजी का आशीर्वाद मिलेगा, तो इसमें परेशानी की क्या बात है?
अंत में, अधिक भाषण न देते हुए बस इतना ही कहना है कि जो भी कीजिए, बिना लाग-लपेट के कीजिए। क्योंकि दिमाग की एक सीमा रेखा होती है सोचने की, उसके बाद वह थक जाता है। इसलिए दिल से सोचिए और फिर कीजिए। एक फिल्म में कबीर बेदी का संवाद है कि “जहाँ से लोग सोचना बंद कर देते हैं, वहाँ से मैं सोचना शुरू करता हूँ।” लेकिन उस किरदार ने गलत सोचा और अंत में उसका भी अंत हो गया। यह भले ही काल्पनिक बात हो, पर संदेश स्पष्ट है कि “बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय।”
पौधारोपण करते समय यह ध्यान रखना होगा कि हम अपने दिलो-दिमाग की जमीन पर क्या लगा रहे हैं—आम या बबूल। आम को फल देने तक उसकी सेवा करनी ही पड़ेगी, जो आने वाली पीढ़ियों को हमारे प्रति आदर और सम्मान से याद करने के लिए प्रेरित करेगा। बस इतनी सी बात है, और यही काम की बात है। इस पर हर भारतवासी को काम करना चाहिए।
आपका अपना साथी
विजय के. वर्मा
अध्यक्ष, सहयोग संगीत फाउंडेशन
जिला – बैतूल








