रासलीला प्रसंग में भावविभोर हुए श्रद्धालु, गोवर्धन लीला और एकादशी का बताया महत्व।
विश्वकर्मा मंदिर में छठवें दिन श्रीमद्भागवत गीता ज्ञान यज्ञ में हुआ रासलीला प्रसंग । पूर्णाहुति और भंडारा प्रसादी के साथ आज होगा कथा समापन।

बैतूल। गंज स्थित विश्वकर्मा मंदिर में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत गीता ज्ञान यज्ञ के छठवें दिवस शनिवार को भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला, गोवर्धन लीला और भक्ति के विभिन्न प्रसंगों का रसपूर्ण वर्णन किया गया। बांके बिहारी लाल तेरी जय होवे के संगीतमय भजन के साथ कथा का शुभारंभ हुआ। कथा श्रवण के लिए बड़ी संख्या में माताएं, बहनें और श्रद्धालु उपस्थित रहे।
कथा में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं बैतूल विधायक हेमंत खंडेलवाल, भाजपा जिला अध्यक्ष सुधाकर पवार, आमला-सारणी विधायक डॉ. योगेश पंडाग्रे, घोड़ाडोंगरी विधायक गंगा सज्जन सिंह उइके, मुलताई विधायक चंद्रशेखर देशमुख तथा भैंसदेही विधायक महेंद्र सिंह चौहान ने विश्वकर्मा मंदिर पहुंचकर श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण किया तथा व्यासपीठ से आशीर्वाद प्राप्त किया। इस अवसर पर जनप्रतिनिधियों ने कथा आयोजन की सराहना करते हुए धर्म, संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों के संरक्षण में ऐसे आयोजनों की महत्वपूर्ण भूमिका बताई।

– अधिक मास में भागवत आयोजन को बताया सौभाग्य
कथा के दौरान भागवताचार्य पंडित डॉ. पुष्कर परसाई के पूज्य पिता आचार्य पंडित नरेश परसाई महाराज भी विश्वकर्मा मंदिर पहुंचे। उन्होंने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि पुरुषोत्तम मास और अधिक मास में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन होना अत्यंत सौभाग्य का विषय है। उन्होंने कहा कि भीषण गर्मी के बावजूद बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का कथा में पहुंचना भगवान के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा, निष्ठा और समर्पण का प्रमाण है।

– अमरीश महाराज और गोवर्धन लीला का किया वर्णन
भागवताचार्य डॉ. पुष्कर परसाई ने कथा में राजा अमरीश के चरित्र का वर्णन करते हुए बताया कि वे संपूर्ण विश्व के सम्राट होने के बावजूद गौसेवा और धर्म पालन में अग्रणी थे। उन्होंने कहा कि यदि माता-पिता स्वयं अच्छे संस्कार अपनाएं तो बच्चों में भी अच्छे संस्कार स्वतः विकसित होते हैं। कथा में गोवर्धन लीला का वर्णन करते हुए बताया गया कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी उंगली पर सात दिनों तक गोवर्धन पर्वत धारण कर ब्रजवासियों की रक्षा की। इस प्रसंग में बताया गया कि भगवान को गोविंद नाम इंद्रदेव ने दिया था और उसी के बाद से 56 भोग लगाने की परंपरा प्रारंभ हुई।
– एकादशी व्रत और धर्माचरण का बताया महत्व
कथा के दौरान धर्माचार, उपवास और सनातन परंपराओं का महत्व भी बताया गया। श्रद्धालुओं को बताया गया कि जिस दिन भगवान का सुमिरन किया जाए, वही दिन वास्तविक उपवास का दिन है तथा प्रत्येक व्यक्ति को एकादशी व्रत अवश्य करना चाहिए। आचार्यों ने कहा कि शास्त्रों के अनुसार मध्य रात्रि में नदियों में स्नान नहीं करना चाहिए क्योंकि उस समय वरुण देव का निवास माना गया है। उन्होंने भोजन के दौरान संयम और गौमाता की सेवा के महत्व पर भी प्रकाश डाला तथा कहा कि गौमाता भगवान की भी माता मानी गई हैं।

– विद्या नम्रता और विवेक का मार्ग सिखाती है
आचार्य नरेश परसाई महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि विद्या विवाद नहीं, सम्मान दिलाती है। विद्या मनुष्य में नम्रता और विवेक का विकास करती है तथा जीवन को सही दिशा प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि भक्त की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं और भगवान सबकी दृष्टि से बच सकते हैं, लेकिन अपने भक्त की आंखों से नहीं बच सकते। उन्होंने जगन्नाथपुरी और महादेवदास जी से जुड़े प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान आज भी अपने भक्तों के साथ लीलाएं करते हैं और उनके प्रेम से बंध जाते हैं।
– श्रद्धालुओं का हुआ सम्मान, आज होगा समापन
कथा के दौरान भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला का वर्णन करते हुए बताया गया कि रास का आध्यात्मिक अर्थ इंद्रियों को भगवान में समर्पित करना है। कथा के अंत में व्यासपीठ से भागवताचार्य डॉ. पुष्कर परसाई द्वारा उपस्थित श्रद्धालुओं का दुपट्टा पहनाकर सम्मान किया गया। आयोजन समिति ने बताया कि आज रविवार को पूर्णाहुति, हवन एवं भंडारा प्रसादी के साथ सात दिवसीय श्रीमद्भागवत गीता ज्ञान यज्ञ का समापन होगा। समिति ने सभी श्रद्धालुओं से अधिक से अधिक संख्या में पहुंचकर प्रसादी ग्रहण करने और धर्मलाभ लेने की अपील की है।




