अवैध लेन-देन से बना ऋण कानूनी रूप से वसूली योग्य नहीं।

बैतूल। चेक बाउंस के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने अहम प्रथम दृष्टया अवलोकन देते हुए साफ किया है कि अवैध या अनैतिक अनुबंध से उत्पन्न ऋण के भुगतान के लिए जारी चेक पर नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 लागू नहीं होगी। कोर्ट ने कहा कि ऐसा ऋण कानूनी रूप से वसूली योग्य नहीं माना जा सकता।
के.के.डी. पांडियन बनाम एस. तमिलसेल्वी मामले में न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति जोयमल्या बागची की खंडपीठ ने यह टिप्पणी की। मामला मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें आरोपी को बरी किया गया था। शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर कर तर्क दिया था कि भले ही मूल अनुबंध अवैध हो, लेकिन समझौते के तहत जारी चेक पर धारा 138 लागू होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क से असहमति जताते हुए कहा कि एनआई एक्ट में लीगली एनफोर्सेबल डेब्ट की शर्त सीधे भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 23 से जुड़ी है। यदि मूल अनुबंध ही अवैध या सार्वजनिक नीति के विरुद्ध है, तो उससे जुड़ा कोई भी समझौता या चेक उसे वैध नहीं बना सकता।
कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के 2015 के फैसले, जिसमें अवैध अनुबंध के बाद हुए समझौते को आधार मानकर धारा 138 लागू करने की बात कही गई थी, उस पर भी सवाल उठाए हैं।
इस अवलोकन का सीधा असर जिला अदालतों में लंबित चेक बाउंस मामलों पर पड़ेगा। अब शिकायतकर्ताओं को मूल लेन-देन की वैधता साबित करनी होगी, जबकि आरोपी पक्ष के लिए यह एक मजबूत बचाव बन सकता है।




