बच्चों की परीक्षा और हमारा व्यवहार, घर का वातावरण ही उनकी सबसे बड़ी ताकत
श्रीमती हर्षा मनोज अग्रवाल, शिक्षिका बैतूल

हमारा पूरा जीवन बच्चों के इर्द-गिर्द घूमता है। उनकी पढ़ाई, उनका भविष्य, उनकी सफलता, इन्हीं चिंताओं में माता-पिता अपने जीवन की सहजता को कहीं पीछे छोड़ देते हैं। रोज़मर्रा की ज़िंदगी के प्रपंच, जिम्मेदारियां और अपेक्षाएं हमें ऐसे अनेक क्रियाकलापों में उलझा देती हैं, जहां हम अपने मूल कर्तव्य से भटकने लगते हैं। यही भटकाव धीरे-धीरे हमारे मन में नकारात्मक सोच की किरणें पैदा करता है, जो अनजाने में घर के वातावरण में प्रवेश कर जाती हैं।
यह नकारात्मकता बाहर से दिखाई नहीं देती, पर भीतर ही भीतर पारिवारिक जीवन को दूषित करती रहती है। सबसे अधिक इसका असर बच्चों पर पड़ता है, क्योंकि वे उसी वातावरण में पलते और बढ़ते हैं। अक्सर हमें बच्चों का जीवन केवल स्कूल, परीक्षा और पढ़ाई तक सीमित दिखाई देता है, जबकि हम यह भूल जाते हैं कि बाल मन अब किशोरावस्था की ओर बढ़ रहा होता है। यह समय अत्यंत संवेदनशील होता है, जिसे समझदारी और धैर्य से संभालने की आवश्यकता होती है।
इसी संक्रमणकाल में यदि घर का माहौल तनावपूर्ण, चिड़चिड़ा और नकारात्मक हो जाए, तो बच्चों के मन पर उसका गहरा प्रभाव पड़ता है। माता-पिता की चिंता, झुंझलाहट और अधीरता बच्चों के आत्मविश्वास को कमजोर कर सकती है। इस समय हमें कुछ त्याग करने की आवश्यकता होती है। सबसे बड़ा त्याग है अपना चिड़चिड़ापन। उम्र के इस पड़ाव को शास्त्रों में राहुकाल कहा गया है, जहां निर्णय और भावनाएं असंतुलित हो सकती हैं। यदि हम इसी राहुकाल को अमृतकाल में बदल लें, तो यह हमारे जीवन की भी परीक्षा है और बच्चों की भी।
बच्चों की सफलता केवल उनकी मेहनत से नहीं, घर के भावनात्मक वातावरण से भी तय होती है। परीक्षा के समय उन्हें डांट या दबाव नहीं, समझ, विश्वास और स्नेह की आवश्यकता होती है। जब घर का माहौल शांत, सकारात्मक और भावनात्मक रूप से सुरक्षित होता है, तब बच्चे पूरे मन से पढ़ाई कर पाते हैं और अपने भीतर छिपी क्षमता को पहचानते हैं।
अंततः यह याद रखना आवश्यक है कि बच्चों की परीक्षा के साथ-साथ माता-पिता की भी परीक्षा होती है। यदि हम इस दौर में धैर्य, संयम और सकारात्मकता बनाए रखते हैं, तो बच्चे सफल होने के साथ ही पारिवारिक जीवन भी सशक्त और संतुलित बनता है।
श्रीमती हर्षा मनोज अग्रवाल, शिक्षिका




