बेरोजगारी और पर्यावरण संकट का आदिवासियों ने सुझाया अनोखा मॉडल, 5000 फलदार पौधों की मांग

हरियाली रैली से शुरू हुआ महीनेभर का अभियान, युवाओं के रोजगार के लिए फलदार बागानों का रखा प्रस्ताव  खाली थैलियां और फलों के बीज जुटाकर तैयार करेंगे पौधे, शासन से मांगा सहयोग

बैतूल। बेरोजगारी और बिगड़ते पर्यावरण का समाधान तलाशने के लिए बैतूल जिले के आदिवासियों ने गुरुवार को एक अनोखी पहल शुरू की। श्रमिक आदिवासी संगठन और समाजवादी जन परिषद के बैनर तले आदिवासियों ने शहर में फलदार पौधों के साथ हरियाली रैली निकालकर महीनेभर चलने वाले हरियाली अभियान की शुरुआत की। रैली के माध्यम से युवाओं के लिए रोजगार, पर्यावरण संरक्षण और कुपोषण जैसी समस्याओं का एक साथ समाधान प्रस्तुत करते हुए शासन और आमजन से सहयोग की अपील की गई।

रैली में शामिल आदिवासी किराना सामान की खाली प्लास्टिक थैलियों में लगाए गए पौधे हाथों में लेकर शहरवासियों से अभियान से जुड़ने का आग्रह करते रहे। उन्होंने लोगों से किराना, दूध सहित अन्य सामान की खाली थैलियां तथा पके फलों के बीज देने की अपील की, ताकि उनसे पौधे तैयार कर अगले वर्षा मौसम में गांवों में रोपे जा सकें। इसके बाद प्रतिनिधिमंडल ने कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर शासन से जामुन, आंवला, सीताफल, मुनगा फली और आम सहित 5000 फलदार पौधे निशुल्क उपलब्ध कराने की मांग का ज्ञापन सौंपा। इस दौरान अपर कलेक्टर वंदना जाट ने उद्यानिकी और वन विभाग से चर्चा कर आवश्यक व्यवस्था कराने का आश्वासन दिया।

श्रमिक आदिवासी संगठन के राजेन्द्र गढ़वाल ने कहा कि गांवों के आदिवासी इन पौधों को खेत-बाड़ी और गांवों की अनुपयोगी सार्वजनिक भूमि पर लगाकर उनका संरक्षण करेंगे। समाजवादी जन परिषद के अनुराग मोदी ने दावा किया कि यदि इस अभियान को शासन और समाज का सहयोग मिला तो कुछ वर्षों में जिले के हर गांव में करोड़ों फलदार पौधों के बगीचे विकसित हो सकते हैं। इससे युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलेगा, नदियों में जलस्तर बढ़ाने में मदद मिलेगी, लोगों को सस्ते फल उपलब्ध होंगे और पोषण स्तर में सुधार आएगा। उन्होंने कहा कि भविष्य में इन फलों से पल्प, रस सहित अन्य उत्पाद तैयार करने के छोटे-छोटे उद्योग भी स्थापित किए जा सकते हैं।

– सरकार एक बार इस मॉडल को अपनाने का अवसर दे

रैली में शामिल आदिवासियों ने कहा कि सरकारी योजनाओं में करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते, इसलिए सरकार एक बार उन्हें पौधे उपलब्ध कराकर इस मॉडल को अपनाने का अवसर दे। संगठन के संजय आर्य और रवी ने बताया कि आदिवासी पिछले 26 वर्षों से पर्यावरण संरक्षण, बेरोजगारी और कुपोषण के समाधान के उद्देश्य से यह अभियान चला रहे हैं और अब तक करीब 50 हजार फलदार पौधे लगा चुके हैं। रैली का संचालन कुवरलाल और रामचरण सहित अन्य साथियों ने किया।

– पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के बजाय उसे मजबूत करें

संगठन का कहना है कि आज पूरी दुनिया पर्यावरण संकट, बेरोजगारी और भुखमरी जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। बदलते मौसम के बीच रोजगार के ऐसे मॉडल विकसित करने की जरूरत है जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के बजाय उसे मजबूत करें। इसी सोच के साथ बैतूल के आदिवासी हरियाली अभियान को जनआंदोलन बनाने में जुटे हैं। संगठन ने यह भी उल्लेख किया कि 1970 के दशक में अपनी पुस्तक स्माल इज ब्यूटिफूल में अर्थशास्त्री ई. एफ. शूमाकर ने भी गांधीजी के विचारों के अनुरूप बड़े पैमाने पर पौधरोपण को भारत की बेरोजगारी का प्रभावी समाधान बताया था। संगठन का दावा है कि बैतूल के आदिवासी उसी विचार को जमीन पर उतारने का प्रयास कर रहे हैं।

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