मां ताप्ती प्रवाह क्षेत्र की जमीन निगल गए रसूखदार।
तहसीलदार कार्यालय में चल रही जांच में वर्ष 1917-18 के मिसल बंदोबस्त रिकॉर्ड आए सामने ।

बैतूल। मुलताई में मां ताप्ती के मूल प्रवाह क्षेत्र को लेकर सामने आए राजस्व दस्तावेजों ने बड़ा खेल उजागर कर दिया है। 109 साल पुराने सरकारी रिकॉर्ड बता रहे हैं कि जिस भूमि को कभी तालपानी और नदी प्रवाह क्षेत्र के रूप में दर्ज किया गया था, वही जमीन आज निजी कब्जों और रजिस्ट्रियों में बदल चुकी है। अब सवाल यह खड़ा हो गया है कि आखिर मां ताप्ती की धारा से जुड़ी शासकीय भूमि रसूखदारों के हाथों तक पहुंची कैसे?
ताप्ती विकास प्राधिकरण समिति द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों के आधार पर तहसीलदार कार्यालय में चल रही जांच में वर्ष 1917-18 के मिसल बंदोबस्त रिकॉर्ड सामने आए हैं। इन अभिलेखों में खसरा नंबर 242 रकबा 0.58 एकड़ भूमि मद तालपानी के रूप में दर्ज पाई गई। यानी यह क्षेत्र जल प्रवाह और नदी मार्ग से जुड़ा हुआ था।
लेकिन बाद के वर्षों में यही भूमि अलग-अलग खसरों में बदलकर निजी नामों में दर्ज होती चली गई। जांच में यह भी सामने आया कि वर्तमान खसरा नंबर 560/2 रकबा 0.247 हे० से इस भूमि का संबंध जोड़ा गया है और मौके पर निजी कब्जा पाया गया है।
मामले को और गंभीर बनाने वाला तथ्य वर्ष 1996 का पंजीकृत विक्रय पत्र है। पंजीयन क्रमांक 1294 दिनांक 18/11/1996 के अनुसार खसरा नंबर 560 की भूमि का हिस्सा विक्रय किया गया, जिसकी पश्चिम दिशा की सीमा स्पष्ट रूप से बरसाती सूखा नाला दर्ज है। यानी दस्तावेज खुद स्वीकार कर रहे हैं कि यह क्षेत्र जल निकासी और प्रवाह से जुड़ा था। इसके बावजूद भूमि की खरीद-फरोख्त हुई और कब्जे भी बदलते गए।
दस्तावेजों के अनुसार विक्रेतागण शंकरदास, हनुमानदास, मोतीदास, हरीदास, किसनदास द्वारा भूमि का विक्रय किया गया। वहीं क्रेतागण के रूप में मुरलीधर अग्रवाल, मुरारीलाल अग्रवाल, पुरुषोत्तम अग्रवाल, लखमीचंद अग्रवाल एवं संतोषकुमार अग्रवाल के नाम दर्ज हैं। जांच में यह भी पाया गया कि वर्तमान में उक्त भूमि पर इन्हीं पक्षों का कब्जा है।
जांच प्रतिवेदन में स्पष्ट उल्लेख है कि वर्ष 1917-18 के खसरा नंबर 242 का मिलान वर्तमान खसरा नंबर 560/2 से किया गया, जहां वर्तमान में मुरलीधर, मुरारीलाल, पुरुषोत्तम, लखमीचंद और संतोषकुमार का कब्जा पाया गया। यही तथ्य अब पूरे विवाद का केंद्र बन गया है।
– आधिकारिक दस्तावेज ने बढ़ाई गंभीरता
तहसीलदार कार्यालय की टिप्पणी ने पूरे मामले की गंभीरता और बढ़ा दी है। आधिकारिक दस्तावेज में साफ लिखा गया है कि शासकीय भूमि को निजी भूमि बताकर किस व्यक्ति द्वारा विक्रय किया गया। प्रशासनिक रिकॉर्ड में दर्ज यह टिप्पणी सीधे तौर पर बड़े राजस्व खेल की ओर इशारा कर रही है।
जांच में सामने आया कि वर्ष 1972-73 के अधिकार अभिलेख में पुराना खसरा नंबर 240 एवं 242/3 को मिलाकर नया खसरा नंबर 560 रकबा 1.60 एकड़ (0.647 हे.) बनाया गया। वहीं पुराना खसरा नंबर 242/1 नया खसरा नंबर 563 रकबा 0.38 एकड़ भूमि नदी के नाम दर्ज पाई गई। इसके अलावा पुराना खसरा नंबर 242/2 नया खसरा नंबर 568 रकबा 0.10 एकड़ भूमि सत्यनारायण मंदिर के नाम दर्ज होना पाया गया।
– पहले रिकॉर्ड, फिर सीमाएं बदली
स्थानीय लोगों का आरोप है कि वर्षों से मां ताप्ती के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र पर धीरे-धीरे कब्जे किए गए। पहले रिकॉर्ड बदले गए, फिर सीमाएं बदली गईं और बाद में जमीन की खरीद-फरोख्त कर दी गई। लोगों का कहना है कि यदि नदी प्रवाह क्षेत्र में निर्माण और कब्जे हुए हैं तो यह केवल राजस्व गड़बड़ी नहीं बल्कि धार्मिक आस्था और पर्यावरण दोनों के साथ खिलवाड़ है।
अब पूरे शहर में यही चर्चा है कि क्या प्रशासन इस मामले में सिर्फ औपचारिक जांच करेगा या फिर उन लोगों पर भी कार्रवाई होगी जिन्होंने नदी और शासकीय भूमि को निजी संपत्ति बनाकर बेचने का काम किया। जनता मांग कर रही है कि पुराने रिकॉर्ड, नक्शों और रजिस्ट्रियों की फोरेंसिक स्तर पर जांच हो और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए।




