Folk Art : दीपावली पर आदिवासी समाज के द्वारा परंपरागत रूप से बनाए जाते हैं लोकचित्र गोदोंनी

गांव में खुशहाली का प्रतिक माना जाता है गोदोंनी का अंकन,आदिवासी समाज की पुरातन लोक चित्र कला है गोदोंनी

Betul News : बैतूल। जिले के आदिवासी अंचलों में दीपावली पर्व के चलते आदिवासियों द्वारा अपने घरों में पारंपरिक लोक चित्रकला गोदोंनी बनाई जा रही है। जिस तरह दीपावली पर्व पर घर-घर में रंगोली उथीरी जाती है इस तरह आदिवासी समाज गोदोंनी लोक चित्रकला के माध्यम से दीप पर्व का स्वागत करता है।

लोक चित्रकला में आदिवासी संस्कृति की अमूल्य धरोहर गोदोंनी चित्रकला जिले के आदिवासी समाज में पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही पारंपरिक लोक चित्र कला हैं। आदिवासी जनजीवन में लोक चित्रकारी के रूप बड़े निराले और अजूबे मिलते है ये लोकचित्र अपनी जुदा पहचान देते हैं । इसमें आदिवासी संस्कार,संस्कृति और जीवन धर्मिता के विविध पक्ष उद्घाटित हुए मिलते है आदिवासी समाज में विवाह के दौरान बड़े कलात्मक रंगबिरगें चित्र देखे जा सकते है।

दीपावली के शुभ अवसर पर आदिवासी युवतियां लोकचित्र गोदोंनी गांव के प्रत्येक घर की दिवारों पर लोक चित्र उकेरती है। गांव की युवतियां एक झुण्ड बनाकर लोकगीतों के गायन के साथ गोदोंनी का अंकन करती है तथा घर के सदस्यों को दीपावली की शुभकामना देती है। यह गोदोंनी का अंकन गांव में खुशहाली का प्रतिक माना जाता है। युवतियां का झुण्ड एक साथ स्वर में जब लोकगीत ‘‘गोदोंनी याया वाता रो‘‘गाता है तो बड़े ही आनंद की अनुभूति होती है। यह दीपावली पर्व के आगमन का शुभ संकेत देता हैं।

मिट्टी के रंगों का होता है उपयोग:

लोककला से जुड़े जानकार महेश गुंजेले बताते है कि लोकचित्र गोदोंनी के लिए विविध रंग जो प्राकृतिक होते है वह युवतियों द्वारा ही तैयार किये जाते है रंग तैयार करने में थोड़ा परिश्रम करना पड़ता है इन लोकचित्रों में खास तौर पर मिट्टी के रंगों का उपयोग किया जाता है जैसे चूने से सफेद रंग,गेरू से हल्का लाल रंग इन दो रंगों का ही उपयोग मुख्य रूप किया जाता है। यह रंग आसानी से मिल जाते है। गोदोंनी बनाने के लिए कूंची तथा ब्रस का उपयोग किया जाता है।

ब्रस अगर नहीं मिलता तो खजूर की टहनी या लकड़ी में कपड़ा या रूई का उपयोग किया जाता है। आगे उन्होंने बताया कि लोकचित्र का यह संसार यहीं तक सीमित नहीं है इन चित्रों के साथ आदिवासी समाज की मानवीय संवेदनाएं जुडी हुई है। इनमें पुरातन संस्कृति और वर्तमान जीवन चक्र की विविध छटाओं और झांकियों के छविचित्र मुंह बोलते नजर आते है ये एक विशिष्ट रचना संसार का वातायन देते हैं, भावनाओं का विशाल फैलाव देते है, इच्छाओं का आकाश बांधते है और अभावों के दुख का सुख में परिणत करते हैं।

आदिवासी लोकचित्र गोदोंनी के माध्यम से यह सहज ही कहा जा सकता है कि मानव का संबंध केवल मानव से इसी लोक से नहीं है उसका जीवन कई दिशाओं से बंधा हुआ है वह अदृष्य शक्तियों के बिना भी नहीं रह सकता प्रत्यक्ष अनुभव के द्वारा भले ही कुछ पता न चले पर अदृश्य रूप में अप्रत्यक्षतः अलौकिक शक्तियों के हाथों हम सब चलायमान हैं स्वयं अकेले कुछ नहीं है। आदिवासी लोकचित्र गोदोंनी आदिवासी आस्था और विश्वास के अटक फलक है जो हमारी जीवनी शक्ति के प्राण तत्व बन हमारा मंगल करते हैं। आज यह लोकचित्र शैली लुप्त होने की कगार पर है इसे संरक्षण की आवश्यकता है यह प्रयास सभी ओर से होने आवश्यक हैं।

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