पक चिक पक राजा बाबू

व्यंग्य - ऋषि सहगल, आमला

पक चिक पक राजा बाबू

शाम होते होते दारू के जुगाड के लिए राजा बाबू अपना जमीर और ना जाने क्या क्या बेच सकता है, एक श्रेष्ठ नागरिक जिसमे इतनी अकड़ है कि वो अपनी गलत बात को मनवाने के लिए राजा बाबू से कुछ भी लिखवा सकता है, बस श्रेष्ठ व्यक्ति के अहंकार की संतुष्टि होनी चाहिए। वैसे तो एक उम्र के बाद इंसान सही गलत में फर्क करना सीख जाता है लेकिन अहंकार का क्या करे ?

पहले भी नारी उत्पीड़न से कर्मों का फल प्राप्त कर चुके लेकिन, वाह रे अहंकार !!!!

रस्सी जल गई पर बल नही गया !

श्रेष्ठ व्यक्ति के इस मिशन में गुलाम राजा बाबू विदेशी धन वर्षा से तृप्त और नतमस्तक होकर अपना पूर्ण समर्पण दिखाकर, श्रेष्ठ व्यक्ति जो बोले, बगैर सोचे समझे लिखते जाते है, अपनी रोजी लेखनी से गलत लिखवाना एक दिन सब खत्म कर देगा राजा बाबू !!!

शासकीय कर्मचारी को झूठा फसा कर डरा धमका कर, अपने फायदे के लिए पैसे ऐंठे जाते है और दूसरी तरफ से उन्ही के शुभचिंतक बन कर उन के साथ विश्वासघात किया जाता है वाह रे समाज सुधारक राजा बाबू, पर दारू, पैसा राजा बाबू को अंधा बना देता है। अब तो आदत हो गई है मार खाने की राजा बाबू को इसलिए अब फर्क नही पड़ता चाहे इस विधि विरुद्ध कमाई से उसके कर्मो की सजा उसके आपनो को ही क्यों न मिले ।

वैसे विदेशी पैसे देने वाले को हिसाब भी तो देना है? खैर राजा बाबू का वर्तमान बहुत ऐश में बीत रहा है, हां कभी कभी मुंह छुपाके घूमना पड़ता है पर राजा बाबू को कोई फर्क नहीं पड़ता आखिर इनका सपना है कि दूसरो को लूट कर करोड़पति बनना है। धन्यवाद

नोट – इस व्यंग्य का किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है।

लेखक – ऋषि सहगल, आमला

 

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