जमानत प्रावधानों में बड़ा बदलाव।

जिला न्यायालयों में वकीलों की बढ़ी भूमिका ।

बैतूल। नई आपराधिक प्रक्रिया व्यवस्था के तहत भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 एक जुलाई 2024 से लागू हो चुकी है और इसने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी, 1973) का स्थान ले लिया है। जमानत से जुड़े प्रावधान अध्याय एक्स एक्स एक्स वी की धारा 478 से 496 में समाहित हैं, जिनमें कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। अधिवक्ता भारत सेन के अनुसार, इन प्रावधानों का उद्देश्य विचाराधीन कैदियों को राहत देना और जांच प्रक्रिया को समयबद्ध बनाना है।

संहिता की धारा 2(1)(बी) में जमानत की परिभाषा स्पष्ट की गई है, जिसके तहत आरोपी को बांड या जमानत बांड पर शर्तों के साथ रिहा किया जाता है। धारा 478 के तहत जमानतीय अपराधों में आरोपी को जमानत का अधिकार है, वहीं धारा 480 के तहत गैर-जमानतीय मामलों में न्यायालय विवेकाधीन निर्णय लेता है। अग्रिम जमानत की व्यवस्था धारा 482 में है, जिसमें प्रक्रिया को सरल बनाते हुए अनिवार्य सुनवाई और आवेदक की उपस्थिति की शर्तों को कम किया गया है, जिससे मामलों का निपटारा तेज हो सके।

डिफॉल्ट जमानत को लेकर धारा 187(3) को मजबूत बनाया गया है। सात वर्ष तक की सजा वाले मामलों में 60 दिन और गंभीर अपराधों में 90 दिन के भीतर चार्जशीट दाखिल नहीं होने पर आरोपी को जमानत का अधिकार मिल जाता है। पुलिस हिरासत की अवधि 15 दिन तक रखी गई है, जिसे न्यायिक हिरासत के शुरुआती चरण में विभाजित किया जा सकता है, जिससे जमानत की गणना प्रभावित हो सकती है।

अंडरट्रायल कैदियों के लिए धारा 479 को महत्वपूर्ण राहत के रूप में देखा जा रहा है। पहली बार अपराध करने वालों को अधिकतम सजा के एक तिहाई समय के बाद व्यक्तिगत बांड पर रिहाई का प्रावधान है, जबकि अन्य मामलों में आधी सजा पूरी होने पर जमानत मिल सकती है। जेल अधीक्षकों को ऐसे कैदियों की पहचान कर न्यायालय को रिपोर्ट देने का दायित्व भी सौंपा गया है।

संहिता में जमानत बांड और व्यक्तिगत बांड की परिभाषा को स्पष्ट किया गया है और न्यायालय को शर्तों के साथ समय-सीमा तय करने का अधिकार दिया गया है। बहु-आरोपी मामलों में जमानत प्रक्रिया को लेकर सावधानी बरतने की आवश्यकता बताई गई है, जबकि गंभीर अपराधों में सख्ती बनाए रखने के निर्देश हैं।

जिला न्यायालय स्तर पर अधिवक्ताओं को धारा 479 और 187(3) का प्रभावी उपयोग करने की सलाह दी गई है। अग्रिम जमानत के मामलों में आरोपी की भूमिका और मामले की प्रकृति को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करने पर जोर दिया गया है। साथ ही, उच्च न्यायालयों और सत्र न्यायालयों को जमानत याचिकाओं का शीघ्र निपटारा करने के निर्देश दिए गए हैं।

अधिवक्ता भारत सेन का कहना है कि बीएनएसएस में जमानत को नियम और जेल को अपवाद बनाने की दिशा में प्रयास किया गया है। यदि इन प्रावधानों का सही क्रियान्वयन हुआ, तो जेलों में विचाराधीन कैदियों की संख्या कम होने के साथ न्याय व्यवस्था अधिक प्रभावी और मानवीय बन सकती है।

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