चैक बाउंस मामले में अभियुक्त दोषमुक्त, ऋण का वैध प्रमाण नहीं दे पाया परिवादी

ऋण सिद्ध न होने से धारा 138 में बरी, न्यायालय का स्पष्ट फैसला, संदेह से परे ऋण साबित करना परिवादी की जिम्मेदारी

बैतूल। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी बैतूल ने परिवाद प्रकरण क्रमांक 461/2023 परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के अंतर्गत दर्ज चैक बाउंस प्रकरण में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए अभियुक्त कंचन पति राजकुमार गौर को दोषमुक्त कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि परिवादी दुर्गाप्रसाद पिता किशनलाल तिलंते यह प्रमाणित करने में असफल रहे कि विवादित चैक किसी वैध रूप से वसूली योग्य ऋण या दायित्व के उन्मोचन के लिए जारी किया गया था।

प्रकरण के अनुसार दुर्गाप्रसाद तिलंते ने आरोप लगाया था कि जनवरी 2020 में अभियुक्त कंचन गौर ने अपने ब्यूटी पार्लर व्यवसाय के लिए 1 लाख 36 हजार रुपये नगद उधार लिए थे और उसी राशि की वापसी के लिए 22 दिसंबर 2020 को एचडीएफसी बैंक शाखा बैतूल गंज के खाते का चैक क्रमांक 000037 प्रदान किया था। चैक 24 दिसंबर 2020 को बैंक में प्रस्तुत करने पर ड्रॉअर्स सिग्नेचर डिफर्स टिप्पणी के साथ अनादरित हो गया था। इसके बाद 16 जनवरी 2021 को मांग सूचना पत्र भेजा गया, लेकिन भुगतान नहीं हुआ।

न्यायालय ने साक्ष्यों के परीक्षण में पाया कि परिवादी द्वारा ऋण लेन-देन की तिथि, आय के स्रोत, नगद राशि देने का विश्वसनीय प्रमाण, बैंक स्टेटमेंट या कोई लिखित दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया। वहीं परिवादी ने प्रतिपरीक्षण में यह भी स्वीकार किया कि अभियुक्त से उसकी सीधी मित्रता नहीं थी और ऋण से संबंधित कोई पंजीकृत दस्तावेज मौजूद नहीं है।

*बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता भारत सेन* ने प्रभावी रूप से यह तर्क रखा कि अभियुक्त द्वारा विवादित चैक बैंक समूह ऋण के दौरान केवल औपचारिकता के लिए रिक्त अवस्था में दिया गया था और उस पर अभियुक्त के हस्ताक्षर नहीं हैं। अधिवक्ता भारत सेन ने यह भी रेखांकित किया कि अभियुक्त और परिवादी के बीच कोई प्रत्यक्ष ऋण संव्यवहार सिद्ध नहीं हुआ है। न्यायालय ने बचाव पक्ष की दलीलों को संभावनाओं की प्रबलता के आधार पर स्वीकार किया।

अदालत ने यह भी माना कि चैक अनादरित होना और सूचना पत्र भेजा जाना प्रमाणित है, लेकिन धारा 138 के लिए आवश्यक मूल तत्व, यानी वैध ऋण या दायित्व का अस्तित्व, संदेह से परे सिद्ध नहीं हुआ। इसी आधार पर अभियुक्त कंचन पति राजकुमार गौर को दोषमुक्त कर दिया गया और उनके जमानत मुचलकों को भारमुक्त किया गया। यह फैसला 29 जनवरी 2026 को खुले न्यायालय में घोषित किया गया।

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