भूली-बिसरी यादें: मुंशी प्रेमचंद की कहानी हीरा मोती का अत्याचारी ज़मींदार था बैतूल का बेटा पी. कैलाश, मुलताई में जन्मे अभिनेता ने 43 फिल्मों में निभाए थे दमदार किरदार

बैतूल। हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर में बैतूल जिले के मुलताई में जन्मे अभिनेता पंडित कैलाशचंद्र शर्मा पी. कैलाश ने अपनी दमदार अदाकारी से अलग पहचान बनाई। वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं साहित्यकार डॉ. रामकिशोर दयाराम पंवार रोंढ़ावाला की पुस्तक मेरा बेतूल में प्रकाशित संस्मरण बैतूल और हिंदी सिनेमा के इस गौरवशाली रिश्ते को सामने लाता है।
3 फरवरी 1924 को मुलताई में जन्मे पी. कैलाश ने प्रारंभिक शिक्षा अकोला में प्राप्त की और वर्ष 1946 में अभिनय के सपने के साथ मुंबई पहुंचे। उनकी प्रभावशाली कद-काठी, दमदार आवाज़ और व्यक्तित्व से प्रभावित होकर निर्माता सेठ चंदूलाल शाह ने उन्हें रंजीत मूवीटोन की फिल्म ‘जय हनुमान’ (1948) में अभिनेत्री निरूपा रॉय के साथ नायक का अवसर दिया।
पी. कैलाश ने अपने फिल्मी करियर में करीब 43 फिल्मों में अभिनय किया। जय हनुमान, नादिर शाह, महाभारत, प्रभु की महिमा, वीर अर्जुन, गोपाल कृष्ण, थीफ ऑफ बगदाद, लीडर, हीरा मोती और इरादा जैसी फिल्मों में उन्होंने यादगार भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने राज कपूर, दिलीप कुमार और निरूपा रॉय सहित उस दौर के कई दिग्गज कलाकारों के साथ काम किया।
मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी दो बैलों की कथा पर आधारित फिल्म हीरा मोती में अत्याचारी और घमंडी ज़मींदार का उनका किरदार आज भी याद किया जाता है। मुलताई क्षेत्र की जमींदारी व्यवस्था को नजदीक से देखने का अनुभव उनके अभिनय में साफ दिखाई दिया। इसी प्रभावशाली अभिनय से प्रभावित होकर निर्देशक कृष्ण चोपड़ा ने उन्हें अपनी अगली फिल्म गबन में भी महत्वपूर्ण भूमिका दी, जिसे बाद में हृषिकेश मुखर्जी ने पूरा किया।
फिल्मी सफलता के बावजूद पी. कैलाश का अपनी जन्मभूमि मुलताई से गहरा जुड़ाव बना रहा और वे अक्सर यहां आते थे। 23 मई 1967 को मुलताई प्रवास के दौरान हृदयाघात से मात्र 43 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया था। उनके निधन के बाद पायल की झंकार, थीफ ऑफ बगदाद और वर्ष 1971 में इरादा प्रदर्शित हुई।
पी. कैलाश अपने पीछे पत्नी, एक पुत्र और दो पुत्रियों का परिवार छोड़ गए थे, लेकिन अपने अभिनय के कारण आज भी भारतीय सिनेमा के इतिहास में जीवित हैं। बैतूल के लिए यह गर्व की बात है कि जिले की माटी में जन्मे इस कलाकार ने हिंदी फिल्मों में विशिष्ट पहचान बनाई। नई पीढ़ी को उनके योगदान से परिचित कराना जिले की सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।




