बगलामुखीः स्वतंत्रता और मुक्ति की शक्ति।

दस महाविद्याओं में आद्या शक्ति बगलामुखी आठवें स्थान पर विराजमान हैं। उनका पीत वर्णं और सौम्य स्वरूप होते हुए भी वे कठोर दिखती हैं, क्योंकि उन्होंने शत्रु की जिह्वा को पकड़ा हुआ है। सामान्यतः साधक सोचते हैं कि यह साधना केवल बाहरी शत्रुओं को चुप कराने के लिए है, परंतु इसका सबसे महत्वपूर्ण पश्न यह है कि बगलामुखी आपको स्वतंत्र करती हैं।

वाणी का बंधन और मन का नियंत्रण

संसार में प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी बंधन में है। यह बंधन बाहर से नहीं, बल्कि भीतर से है और इसका मुख्य कारण ‘वाणी’ है। हमारी ‘क्रिया’ लक्ष्मी का क्षेत्र है, और ‘वाणी’ सरस्वती का। हमारी क्रिया हमारे मन के अधीन है, लेकिन मन पूरी तरह वाणी के नियंत्रण में होता है। यदि कोई आपसे दो मीठे शब्द कह दे, तो आपका मन जोश से भर जाता है और आपकी क्रिया शक्ति बढ़ जाती है। इसके विपरीत, यदि कोई कठोर वचन कह दे, तो मन उन्हीं शब्दों पर अटक जाता है और क्रिया रुक जाती है। गुरुदेव एक मर्मस्पर्शी उदाहरण देते हैं कि जिस प्रकार एक पशु रस्सी से बंधा उसी परिधि में घूमता रहता है, वैसे ही मनुष्य वर्षों पहले कही गई किसी कड़वी बात की परिधि में घूमता रहता है। शरीर का घाव भर जाता है, पर वाणी का प्रहार भीतर कुंडली मारकर बैठ जाता है। यही कारण है कि वाणो को ‘अस्त्र’ भी कहा गया है और ‘मंत्र’ भी।

गुरुदेव एक साधक का संस्मरण साझा करते हैं, जो तनाव में हकलाने लगता था। जांचने पर पता चला कि बचपन में उसके पिता की डांट ने उसके मन को वहीं पांच वर्ष की आयु पर बांध दिया था। आज पिता के न।रहने पर भी वह साधक उसी मानसिक बंधन में जकड़ा हुआ था। गुरुदेव समझाते हैं कि असली शत्रु बाहर नहीं, हमारे भीतर है, जिसने हमें बंधनों में बांध रखा है। भगवती बगलामुखी इसी ‘भीतर के शत्रु’ को शांत करने और बंधन खोलने की शक्ति हैं।

वाणी में केवल चोट पहुंचाने की नहीं, बल्कि जीवन बदलने की भी शक्ति है। रनावली के एक कटु वचन ने तुलसीदास जी के हृदय को ऐसा बींधा कि वे गोस्वामी तुलसीदास बन गए। गुरु का एक वचन साधक के भीतर साधना की ज्योति जला देता है। बगलामुखी साधना का अर्थ यह है कि जो वाणी आपको नीचे गिरा रही है, वह निष्प्रभावी हो जाए और जो वाणी आपको ऊपर उठा सकती है, वह आपके भीतर प्रकट हो जाए।

स्तंभन का वास्तविक अर्थः अपनी जिह्वा को साधना समाज में अब युद्ध तीर-तलवारों से नहीं, बल्कि शब्दों से होते हैं। बगलामुखी के साधक की संवाद शैली प्रखर हो जाती है। वह कम बोलता है और ठोस बोलता है। गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि क्या केवल दूसरों की जिह्वा अनर्थ करती है? नहीं, कई बार हमारी अपनी जिल्ह्वा क्रोध में ऐसे शब्द बोल देती है, जिससे हम अपनों को दूर कर लेते हैं और बाद में पछताते हैं।

बगलामुखी साधना का वास्तविक ‘स्तंभन’ यह है कि जब आप बहुत कुछ कड़वा बोल सकते थे, तब आपने अपनी जिह्वा को रोक लिया। यह अपने भीतर उठते हुए आवेग को स्थिर करने की साधना है। जब आप तत्काल प्रतिक्रिया देना बंद कर देते हैं और रुककर निर्णय लेते हैं, तब समझिए कि बगलामुखी आपके भीतर स्थापित हो रही हैं।

वाणी और लक्ष्मी का सूक्ष्म संबंध एक बहुत बड़ा रहस्य यह है कि जहाँ वाणी संयमित नहीं है, वहां लक्ष्मी स्थिर नहीं रहती। लक्ष्मी केवल धन नहीं, बल्कि ‘लक्ष्य सिद्धि’ और ‘प्रवाह’ की देवी हैं। यदि घर या कार्यालय में संवाद विषैला है, कटाक्ष और अपमान अधिक है, तो वहां स्नेह और ऊर्जा सूखने लगती है। जब मन अपमान से सिकुड़ जाता है, तो क्रिया की शक्ति मंद हो जाती है…. और क्रिया मंद होते ही लक्ष्मी का प्रवाह रुक जाता है। बगलामुखी जब इन वाणी के बंधनों को काटती हैं, तभी समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।

अतः केवल बाहरी शत्रु की समाप्ति की कामना न करें। भगवती से प्रार्थना करेंः ‘हे माते, मेरी जिह्वा को संयम दो, दूसरों के कटु वचनों को मुझ पर निष्प्रभावी कर दो और मुझे वह विवेक दो कि मैं।शब्दों के जाल में न उलझू। बगलामुखी साधना आत्मबल की साधना है। कोई आपको क्या कहता है वह उसका विचार है। आपका सत्य नहीं। जब आप स्वयं के वास्तविक स्वरूप को जान लेते हैं, तो संसार का कोई भी वाक्य आपको विचलित नहीं कर सकता। यह साधना आपके भीतर के कंपन और चंचल मन को रोककर आपको वास्तविक स्वतंत्रता प्रदान करती है।

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