Assembly Election: भैंसदेही में भाजपा को बागी और कांग्रेस को जयस से मिल रही चुनौती

पुराने चेहरों पर दोनों ही दलों के द्वारा दांव लगाए जाने से कार्यकर्ताओं में नजर नहीं आ रहा जोश

Assembly Election : बैतूल। जिले की आदिवासी बहुल भैंसदेही विधानसभा सीट पिछले चुनाव में भाजपा के हाथ से फिसलकर कांग्रेस के पास पहुंच गई थी।इसके बाद भी भाजपा ने वही पुराने चेहरे को मैदान में उतार दिया। कांग्रेस ने भी पुराने चेहरे को जनता की पसंद मानकर टिकट दे दिया। भाजपा में पुराने चेहरे को मौका देने के कारण बगावत के स्वर इतने तेज हो गए कि उन्हें कोई रोक नहीं पाया जबकि कांग्रेस के सामने जयस एक मजबूत दीवार बनकर खड़ा हो गया।चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में जिले की भैंसदेही विधानसभा सीट की जो तस्वीर सामने आ रही है उसमें जनता का समर्थन हासिल करने से पहले भाजपा को बागियों और कांग्रेस को जयस की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। इस दशा में ऊंट किस करवट बैठेगा यह भविष्य के गर्त में है।

भैंसदेही विधानसभा क्षेत्र में आजादी के बाद से अब तक कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों के विधायक रहे हैं लेकिन विकास की रोशनी अब तक कई गांवों में नही पहुंच पाई है। विकास के दावे करने वाले भाजपा के नेताओं की पोल एक गांव के लोगों ने तब खोलकर रख दी जब वे कलेक्टर के पास पहुंचकर यह बताने लगे कि हमारे गांव में तो बिजली भी आज तक नहीं पहुंच पाई है। ग्रामीणों का कहना था कि चांद और मंगल पर हम पहुंच गए हैं लेकिन बिजली के चंद पोल और तार तक हमारे गांव में नहीं बिछाए जा सके।यह कैसा विकास है और विकास के कैसे दावे हो रहे हैं।ग्रामीणों के इन सवालों का न तो कांग्रेस के प्रत्याशी और उनके साथ घूम रहे समर्थकाें के पास है और न ही भाजपा के प्रत्याशी अपने पिछले कार्यकाल और वर्तमान में भाजपा सरकार के विकास को बता पा रहे हैं।मतदाताओं के सवालों पर प्रत्याशियों की चुप्पी के कई मायने भी निकाले जा रहे हैं।

राजनीतिक जानकारों की मानें तो भैंसदेही विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के सामने पूर्व महामंत्री के द्वारा बगावत कर चुनाव मैदान में दम खम के साथ उतरना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। पुराने कार्यकाल के दौरान जनता से किए गए वायदे आज तक पूरे न हो पाना और बिखरे हुए संगठन के दम पर चुनाव मैदान में कामयाब होना मानो लोहे के चने चबाने के समान हो गया है। विकास की राह तक रहे मौन मतदाताओं की चुप्पी आखिर कैसे टूटेगी यह आने वाले वक्त में दिखाई देगा।

इधर कांग्रेस के प्रत्याशी अपने पांच वर्ष के कार्यकाल में जयस की ओर आकर्षित होने वाले आदिवासी समाज के युवाओं के हित में कोई ऐसा काम नहीं कर पाए जिससे उन्हें गांव-गांव में सहयाेग मिल जाता। भैंसदेही के कुछ नेताओं के घेरे में कैद रहने वाले कांग्रेस के प्रत्याशी इस चुनाव के बिखरे हुए मैनेजमेंट के कारण जयस से ही मुकाबला करने में अपनी उर्जा खर्च करते नजर आ रहे हैं।कांग्रेस के बड़े नेताओं ने भी चुनाव प्रचार के दौरान भैंसदेही विधानसभा सीट से अपनी दूरी बनाई उसके कई मायने राजनीति की समझ रखने वाले निकाल रहे हैं।

भाजपा के महामंत्री पद पर कार्य कर चुके राहुल चौहान को भले ही पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है लेकिन वे अपने दम पर चुनाव मैदान में डटे हुए हैं। प्रहार जन शक्ति पार्टी के बैनर तले राहुल चौहान चुनाव मैदान में उतरने के बाद से लगातार क्षेत्र में जन संपर्क कर रहे हैं। ऐसे में भैंसदेही विधानसभा क्षेत्र में चुनावी मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है। मतदाता अभी मौन साधे बैठे हुए हैं और 17 नवंबर को वे किसे पसंद कर मतदान करते हैं यह तो तीन दिसंबर को जब नतीजे आएंगे तब ही सामने आएगा।

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