तपस्या से अवतरित हुई गंगा, अब 2500 करोड़ के बजट से संवर्धन का दावा..

कुएं गायब, तालाब सूखे और मां माचना मौन, फिर भी जल गंगा अभियान जारी|

बैतूल। जल गंगा संवर्धन अभियान को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता हेमंत चंद्र दुबे बबलू ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि जिस गंगा को राजा भागीरथ ने वर्षों की तपस्या से धरती पर अवतरित कराया था, आज उसी जल संरक्षण के नाम पर करोड़ों के बजट की घोषणाएं की जा रही हैं। उन्होंने कहा कि गंगा नदी को धरती पर लाने में किसी प्रकार का बजट नहीं था, बल्कि नदियों की अविरलता और जल स्रोतों को बचाने के लिए तपस्या और जनभागीदारी की आवश्यकता थी।

उन्होंने कहा कि आज स्थिति यह है कि लोग नदियों, तालाबों और कुओं के साथ जीना भूल गए हैं और केवल सरकारी बजट के सहारे अभियान चलाने की परंपरा बन गई है। उन्होंने सवाल उठाया कि बैतूल के पुराने कुएं आखिर कहां गायब हो गए, गांधी चौक का कुआं कब और कैसे बंद हो गया, और मां माचना नदी अपनी अविरलता क्यों खोती चली गई। उन्होंने कहा कि कोठी बाजार बड़ा तालाब और कर्बला घाट जैसे स्थानों पर जल गंगा संवर्धन अभियान क्यों नहीं चलाया जाता, जबकि बड़े-बड़े बैनर पोस्टरों के साथ केवल औपचारिक कार्यक्रम किए जा रहे हैं।

उन्होंने आगे कहा कि नदियों को मां कहने या आरती करने से नदियां नहीं बचतीं, बल्कि पॉलीथिन और प्लास्टिक से मुक्ति दिलाने और जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। उन्होंने प्रोफेसर जी.डी. अग्रवाल का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने गंगा की अविरलता के लिए 111 दिन का अनशन किया और अपने प्राण न्यौछावर कर दिए, लेकिन समाज आज भी उनके संघर्ष को सही मायनों में याद नहीं कर पाया है।

हेमंत चंद्र दुबे बबलू ने यह भी कहा कि प्रतिवर्ष लाखों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद तालाब, पोखर और कुएं लगातार खत्म होते जा रहे हैं और हर घर जल की योजनाओं के बावजूद पानी के टैंकर सड़कों पर दौड़ते दिखाई देते हैं। उन्होंने शहीद दिवस का उल्लेख करते हुए कहा कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को श्रद्धांजलि भी अब सुविधानुसार दी जा रही है, जो चिंताजनक स्थिति को दर्शाती है।

उन्होंने कहा कि जल गंगा संवर्धन का वास्तविक मार्ग केवल बजट नहीं, जनभागीदारी और जल स्रोतों की चौकीदारी से ही संभव है, और हर नागरिक को भगीरथ बनना होगा तभी नदियों की अविरलता और निरंतरता वापस लाई जा सकेगी।

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