चैक बाउंस मामले मे सुनवाई के दौरान संकट में पड़ गया परिवादी।
बैतूल की अदालत ने कहा – बिना आयकर रिटर्न के वित्तीय क्षमता कैसे साबित होगी?

बैतूल। जिला बैतूल के न्यायिक दण्डाधिकारी प्रथम श्रेणी, भैंसदेही की अदालत में चेक बाउंस के एक महत्वपूर्ण मामले में एक ऐतिहासिक फैसला आया है, जिसने आयकर रिटर्न के कानूनी महत्व को पूरे देश के सामने उजागर कर दिया है।
मामला क्या है?
परिवादी महेश घीघोड़े निवासी भैंसदेही ने आरोपी भारत डढ़ोड़े निवासी नयेगांव, तहसील आठनेर पर परक्राम्य लिखत अधिनियम 1881 की धारा 138 के तहत परिवाद दायर किया था। आरोप था कि अक्टूबर 2019 में परिवादी ने आरोपी को ₹2 लाख नकद उधार दिए थे। रकम वापस करने के लिए आरोपी ने 10 अक्टूबर 2020 को बैंक ऑफ इंडिया का चेक नंबर 133895 जारी किया, जो अपर्याप्त निधि के कारण अनादरित हो गया। कानूनी नोटिस के बावजूद आरोपी ने रकम नहीं लौटाई।
विचारण के दौरान जो हुआ…
बचाव पक्ष के अधिवक्ता भारत सेन ने परिवादी महेश घीघोड़े से कड़ी जिरह की। परिवादी ने खुद को कृषक, मछली पालन करने वाला और विद्यालय संचालक बताया तथा दावा किया कि उन्होंने आयकर रिटर्न दाखिल किया है और उधार दी गई रकम उसमें दिखाई गई है।
बचाव पक्ष ने दूसरा परिवाद पत्र पेश किया जिसमें परिवादी ने नवंबर 2019 में ही एक अन्य व्यक्ति (ग्राम पंचायत सचिव) को 7 लाख रु उधार दिए थे। कुल 9 लाख रु की रकम सिर्फ दो महीने में उधार देने पर सवाल उठाया गया – ऐसी भारी रकम कहां से आई? वार्षिक आय क्या है?
– अदालत का फैसला
बचाव पक्ष ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 91 के तहत याचना की कि परिवादी अपनी आयकर रिटर्न (वित्तीय वर्ष 2019-20, 2020-21, 2021-22) और ऑडिटेड बैलेंस शीट अदालत में पेश करें। परिवादी ने घोर आपत्ति जताई कि वे पहले ही सब दस्तावेज पेश कर चुके हैं।
न्यायिक दण्डाधिकारी महेन्द्र सिंह ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद बचाव पक्ष की याचना स्वीकार कर ली और परिवादी महेश घीघोड़े को आयकर रिटर्न तथा ऑडिटेड बैलेंस शीट दाखिल करने का स्पष्ट निर्देश दिया।
अदालत ने अपने आदेश में साफ कहा:
परिवाद के न्यायपूर्ण निराकरण के लिए परिवादी की वित्तीय क्षमता स्थापित होना अत्यंत आवश्यक है। जब कोई व्यक्ति इतनी बड़ी रकम नकद उधार देता है, तो आय का वैध स्रोत साबित करना उसका दायित्व है। आयकर रिटर्न इसी का सबसे मजबूत और प्रमाणिक दस्तावेज है।
टैक्स एडवोकेट का विश्लेषण
यह फैसला पूरे देश के छोटे-बड़े कर्जदाताओं, व्यापारियों और सैलरीड क्लास के लिए चेतावनी और शिक्षा दोनों है।
आजकल चेक बाउंस, सिविल सूट या संपत्ति विवाद में अदालत सबसे पहले पूछती है –पैसे कहां से आए?
आईटीआर न दाखिल करने वाले या गलत आईटीआर भरने वाले व्यक्ति कोर्ट में अपनी बात साबित नहीं कर पाते और कई बार उनका पूरा केस कमजोर हो जाता है।
इस फैसले से साबित हुआ कि -आईटीआर सिर्फ टैक्स बचाने का कागज नहीं, बल्कि वित्तीय विश्वसनीयता का सबसे बड़ा प्रमाण है। 2 लाख या 9 लाख जैसी रकम उधार देते समय आईटीआर में दिखाना जरूरी है। बिना आईटीआर के नकद उधार का दावा अदालत में टिकता नहीं।
सलाह टैक्स एडवोकेट के रूप में हर व्यक्ति, चाहे उसकी आय टैक्स की सीमा से कम ही क्यों न हो, हर साल आईटीआर दाखिल जरूर करें। खासकर कृषक, छोटे व्यापारी, मछली पालन या स्कूल संचालक जैसे लोगों के लिए आईटीआर आज सुरक्षा कवच बन गया है। अगर आप भी किसी को उधार देते हैं या चेक लेते हैं, तो याद रखें बिना आईटीआर के कोर्ट में आपकी बात नहीं चलेगी। यह फैसला बैतूल जिले में ही नहीं, पूरे मध्यप्रदेश और देशभर में आईटीआर की अनिवार्यता को नई मिसाल पेश कर रहा है।




