साधक जब तक देहाभिमान रूपी समुद्र नहीं पार करेगा तब तक सीता दर्शन दुर्लभ है: पं निर्मल कुमार शुक्ल।
श्री हनुमत कथा महोत्सव पंचम दिवस ।

बैतूल। भगवान श्री राम ने वानरों को सीता का पता लगाने के लिए भेजा और ए वानर समुद्र किनारे तक तो पहुंच गये किन्तु संपाती ने बताया कि सीता सौ योजन सागर के उस पार अशोक वाटिका में बैठी हैं जो समुद्र पार कर जाएगा उसे उनका दर्शन हो जाएगा। सारे वानरों ने अपने अपने बल का वर्णन किया किंतु सौ योजन तक जाने में कोई समर्थ नहीं हो सका। युवराज अंगद ने घोषणा किया मैं सागर पार तो जा सकता हूं किन्तु वापस लौटने में संदेह है।वस्तुतः समारा अभिमान ही सागर है और जिसमें मैं पना भरा हुआ है वह अभिमान सागर को नहीं पार कर सकता।
इन वानरों ने निज निज बल सब काहू भाखा। अपने अपने बल का वर्णन किया अपने बल से कोई अभिमान सागर कैसे पार करेगा यह अभिमान समुद्र तो भगवान के बल और उनकी कृपा से ही पार किया जा सकता है। अंत में जामवंत ने हनुमान को जगाया जिसने अपने मान अभिमान और अपमान से मुक्ति पा लिया हो वही हनुमान है। हनुमान जी जब भगवान श्री राम को हृदय में धारण करके लंका की ओर प्रस्थान करते हैं तो मार्ग में उनके सामने चार बाधाएं आईं। वस्तुतः साधना के मार्ग में यही चार बाधाएं हर साधक के सामने आती है जो इन्हें पार कर जाता है उसे ही आदिशक्ति सीता का दर्शन होता है। पहली बाधा के रूप में मैनाक पर्वत आया यह स्वर्ण का पर्वत है और हनुमान के पिता पवन देव का मित्र है।जब इंद्र ने पर्वतों के पंख काटने शुरू किए तो पवन देव ने इसे उड़ाकर सागर के गहरे जल में छिपा दिया। उसने पिता का ऋण चुकाने के लिए इन्हें पीठ पर बिठाना चाहा किन्तु हनुमान ने प्रणाम करके उसे विदा कर प्रकार लोभ पर विजय प्राप्त किया।दूसरी बाधा के रूप में सुरसा आई क्योंकि हनुमान ने लोभ के स्वरूप मैनाक पर विजय पाया है। मनुष्य जब लोभ को जीत कर त्याग के मार्ग पर चलना प्रारंभ करता है तो कीर्ति मिलती ही है।
देवताओं के द्वारा भेजी गई सुरसा नागों की माता है इसे देवताओं ने हनुमान जी की परीक्षा लेने भेजा है। लंका जैसे नगर में विश्व विजेता रावण से सामना होगा अतः हनुमान के बुद्धि और बल का अनुमान करना आवश्यक है। सुरसा ने आकर कहा देवताओं ने मुझे तेरा भक्षण करने भेजा है मैं तुम्हें खाऊंगी। हनुमान ने आग्रह किया माता पहले सीता जी का पता लगाकर मैं राम को बता दूं फिर मुझे खाना लेकर उसने खाने के लिए एक योजन मुंह फैलाया तो हनुमान तुरंत 2 योजन हो गये। उसने चार योजन बढ़ाया तो हनुमान आठ योजन हो गये।
अंत में सुरसा ने 100 तक मुंह फैलाया बस हनुमान जी तुरंत छोटे से बन गये और उसके मुंह में जाकर वापस आ गए। सुरसा बडी प्रसन्न हुई उसे हनुमान जी के बल और बुद्धि का पता चल गया आशीर्वाद देकर वह देवलोक चली गई। आध्यात्मिक दृष्टि से सुरसा हमारी कीर्ति है इसीलिए लिए हनुमान जी ने इसे मारा नहीं जबकि यही कार्य करने पर सिंहिका और लंकिनी पर प्रहार कर दिया था। मनुष्य को कीर्ति का विनाश नहीं करना चाहिए क्योंकि कीर्ति हमसे सत्कर्म कराती है। कीर्ति के लोभ में ही तो मनुष्य अच्छे काम करता है इसलिए मनुष्य को अपने कीर्ति की रक्षा करना चाहिए लेकिन जब हमारी कीर्ति सौ योजन हो जाय तो हमें हनुमान जैसे छोटा बन जाना चाहिए।बस इस प्रकार साधक कीर्ति पर विजय पा लेगा।तीसरी बाधा के रूप में सिंहिका आई। ए सागर के गहरे जल में रहती है और आकाश में उड़ने वाले प्राणी को खा लेती है। इसने हनुमान को भी खाने का प्रयास किया किंतु हनुमान जी ने सिंहिका को मार डाला क्योंकि यह हमारे जीवन की ईर्ष्या है कीर्ति को बचा कर रखना चाहिए लेकिन ईर्ष्या का तो समूल नाश ही कर देना चाहिए। यह ऊपर उठने वाले को खा लेती है यही कार्य तो ईर्ष्या भी करती है। ईर्ष्या नीचे वाले से नहीं होती यह ऊपर उठने वाले को गिराती है।इस प्रकार हनुमान जी ने तीसरी बाधा ईर्ष्या का नाश किया।
चौथी बाधा के रूप में लंकिनी मिली जो कि लंका के सिंहद्वार पर रखवाली करती है। इसने हनुमान को चोर घोषित कर दिया और बोली मैं तुम्हें खा जाऊंगी बस एक मुष्टिका प्रहार करके हनुमान ने इसकी दृष्टि बदल दिया।यह अब हनुमान और राम के पक्ष में खडी हो गई। लंकिनी हमारे जीवन की आसक्ति है आसक्ति पर वैराग्य रूपी हनुमान का मुक्का लगा वो भक्ति बन गई और सहायक हो गई। संगीता अवस्थी एवं राजेश अवस्थी शोभित अवस्थी द्वारा आयोजित भव्य हनुमत कथा महोत्सव में मानस महारथी पं निर्मल कुमार शुक्ल ने विशाल श्रोता समूह को भाव विभोर करते हुए उक्त उद्गार व्यक्त किए। यजमान परिवार ने सभी धर्म प्रेमी सज्जनों देवियों से अधिकाधिक संख्या में दोपहर 3 से 6 बजे तक के इस कथा सत्र में पधारने का आग्रह किया है।




