मन्नत पूरी होने पर पालने में डालकर किया बच्चों का नामकरण। देवभिलाई के विठ्ठल मंदिर में गुड़ी पाड़वा पर उमड़ी श्रद्धालुओं की।भीड़।

बैतूल। प्रभात पट्टन तहसील के ग्राम देवभिलाई में स्थित सैकड़ों वर्षों पुराने विठ्ठल मंदिर में गुड़ी पाड़वा का दो दिवसीय धार्मिक आयोजन हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी में सम्पन्न हुआ। आस्था और परंपरा का सबसे बड़ा आकर्षण वह दृश्य रहा जब संतान सुख मिलने पर माताएं अपने बच्चों को मंदिर के पालने में डालकर नामकरण संस्कार करती नजर आईं और भगवान विठ्ठल के प्रति आभार व्यक्त किया।

देवभिलाई गांव में स्थित यह प्राचीन मंदिर कृष्ण धनी अवधूत महाराज की गादी के रूप में मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में विशेष रूप से प्रसिद्ध है। मंदिर के पुजारी भगत संतोष (गोलू) पाटिल ने बताया कि सैकड़ों वर्ष पहले उनके पूर्वज महाराष्ट्र से भगवान विठ्ठल की गादी यहां स्थापित कर लाए थे और तब से यह परंपरा लगातार चल रही है। मंदिर में ध्वज चढ़ाने की जिम्मेदारी भगत देवीदास साकरे निभाते हैं। उन्होंने बताया कि पहले यह कार्य उनके पिताजी करते थे और पीढ़ी दर पीढ़ी साकरे परिवार ही ध्वज चढ़ाने की परंपरा निभा रहा है।

गुड़ी पाड़वा पर मंदिर में दो दिवसीय आयोजन किया जाता है। पहले दिन भजन मंडली द्वारा ढिंढी निकाली जाती है और पूरे गांव में परिक्रमा की जाती है। मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु गेरुए रंग का कपड़ा ध्वज के रूप में भेंट करते हैं। ध्वज चढ़ाने की प्रक्रिया तीन घंटे से अधिक समय तक चलती है और ध्वज के कपड़े दान करने के लिए श्रद्धालुओं की लंबी सूची रहती है, कई लोगों को अपनी बारी के लिए सालभर इंतजार करना पड़ता है।

– संतान सुख की मन्नत लेकर भगवान विठ्ठल के दरबार में आती हैं माताएं

भगत योगीराज ने बताया कि ऐसी मान्यता है कि जो माताएं संतान सुख की मन्नत लेकर भगवान विठ्ठल के दरबार में आती हैं, उनकी मनोकामना पूरी होती है। संतान प्राप्त होने पर गुड़ी पाड़वा के दूसरे दिन सैकड़ों श्रद्धालुओं के सामने माताएं अपने बच्चों को मंदिर के पालने में डालकर नामकरण संस्कार करती हैं और भगवान विठ्ठल का आभार व्यक्त करती हैं।

शिक्षक एवं सामाजिक कार्यकर्ता लीलाधर नागले ने बताया कि मनचाही मुराद पूरी होने पर श्रद्धालु महाप्रसादी के रूप में भंडारे का आयोजन भी करते हैं। देवभिलाई के इस विठ्ठल मंदिर में मध्यप्रदेश के साथ-साथ अन्य प्रांतों से भी हजारों श्रद्धालु हर वर्ष पहुंचकर दर्शन लाभ लेते हैं और सैकड़ों साल पुरानी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

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