“सुरभि… तुम कहीं नहीं गई”।

लेखिका – हर्षा मनोज अग्रवाल।

बहुत भाग्यशाली थी तुम, और भाग्य देने वाली भी, सुरभि बेटी…

तुम चली गई- मन यह मानने को तैयार ही नहीं।

लगता है जैसे तुम जा ही नहीं सकती… और सच तो यही है, तुम गई भी नहीं।

बैतूल की माटी में जन्मी तुम, अपने साथ एक दिव्यता लेकर आई थीं।

शायद यही कारण है कि तुम्हारे इस दुनिया से जाने के बाद भी, न जाने कितने लोग तुम्हें याद करने, तुम्हारे माता-पिता से मिलने उमड़ पड़े।

वह दृश्य किसी साधारण विदाई का नहीं, एक दिव्य आत्मा के दर्शन का सैलाब था।

अखबारों की खबरें और गलियारों की चर्चाएं तो बस माध्यम थीं,

दुख तो पूरे बैतूल ने महसूस किया…

और यूं कहें तो पूरा मध्य प्रदेश, पूरा वातावरण, पूरी प्रकृति शोक में डूबी थी।

सुरभि, जब तुम सशरीर थीं, तब एक घर में गूंजती थीं,

पर अब… तुम पूरी सृष्टि में गुंजायमान हो गई हो।

तुम्हारी यादें अमिट हैं —

हमारे मन में, मस्तिष्क में, हर एक भाव में।

बैतूल की धरती से एक नन्ही चिड़िया उड़कर कहीं दूर चली गई…

पर यह मान लेना कि तुम खो गई हो — यह संभव नहीं।

बैतूल तुम्हें कभी नहीं भूल सकता…

तुम्हारी जन्मदाता मां और पिता तुम्हें कैसे भूल पाएंगे?

कोई नहीं भूल सकता तुम्हें।

तुम कहीं नहीं गई, सुरभि…

तुम यहीं हो…

हमारी सांसों में, हमारे आंसुओं में, हमारी यादों में, हमारे सपनों में।

तुम अमर हो गई हो…

सुरभि… सुरभि… सुरभि…

हर्षा मनोज अग्रवाल।

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