Bjp:दामजीपुरा-झल्लार मंडल अध्यक्ष के चयन से पार्टी कार्यकर्ताओं में असंतोष

निर्वाचन अधिकारी के अलग- अलग सिग्नेचर ने सोशल मीडिया पर मचाई हलचल, पारदर्शिता पर उठा सवाल अध्यक्षों के चयन पर उम्र के नियमों की अनदेखी के आरोप


बैतूल। भारतीय जनता पार्टी ने इस बार अपने संगठन चुनावों को पूरी पारदर्शिता के साथ आयोजित करने का दावा किया था। पार्टी ने अपने नियमों के मुताबिक, मंडल अध्यक्ष पद के लिए 35 से 45 वर्ष आयु सीमा तय की थी। लेकिन बैतूल जिले के दामजीपुरा और झल्लार मंडल में अध्यक्षों के चयन ने पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच विवाद खड़ा कर दिया है।
भैंसदेही विधानसभा के दामजीपुरा मंडल अध्यक्ष अनिल उइके और झल्लार मंडल अध्यक्ष पुष्पा खांडे की उम्र को लेकर विवाद छिड़ा है। सूत्रों के अनुसार, झल्लार मंडल अध्यक्ष पुष्पा खांडे की जन्मतिथि 6 जून 1976 बताई जा रही है, जिससे उनकी उम्र लगभग 48 वर्ष होती है। इसी प्रकार अनिल उइके की उम्र भी निर्धारित सीमा से अधिक बताई जा रही है। भाजपा के संगठनात्मक नियमों के अनुसार, मंडल अध्यक्ष का चयन केवल 35 से 45 वर्ष आयु सीमा के भीतर होना चाहिए, और उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला नहीं होना चाहिए। लेकिन इन दोनों अध्यक्षों के चयन पर इन नियमों की अनदेखी के आरोप लगे हैं।
— बूथ अध्यक्षों की रायशुमारी पर भी उठे सवाल–
भाजपा द्वारा पूरे जिले में गुप्त मतदान प्रणाली से बूथ अध्यक्षों की रायशुमारी कराई गई थी। इसके तहत बूथ अध्यक्षों से तीन नाम मांगे गए थे, जिन्हें बंद लिफाफे में जमा कराया गया। लेकिन कार्यकर्ताओं का कहना है कि इन लिफाफों को नजरअंदाज कर वरिष्ठ नेताओं ने अपनी पसंद के आधार पर अध्यक्षों की घोषणा कर दी।
निर्वाचन अधिकारी सुदर्शन गुप्ता द्वारा 12 दिसंबर और 13 दिसंबर को जारी किए गए मंडल अध्यक्षों की घोषणाओं में सिग्नेचर को लेकर भी सवाल उठे हैं। 12 दिसंबर के घोषणा पत्र में सिग्नेचर हिंदी में हैं, जबकि 13 दिसंबर के पत्र में सिग्नेचर अंग्रेजी में हैं। सोशल मीडिया पर इन सिग्नेचरों की तस्वीरें वायरल होने के बाद कार्यकर्ताओं में आक्रोश बढ़ गया है।
पारदर्शिता पर सवाल
पार्टी कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि चुनाव प्रक्रिया में बूथ अध्यक्षों की रायशुमारी ली गई थी, तो उन लिफाफों का क्या हुआ? जिन नामों का चयन बूथ अध्यक्षों ने किया था, उन्हें नजरअंदाज क्यों किया गया? इस विवाद ने भाजपा के संगठनात्मक चुनावों की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि संगठन के चुनावों में उठे ये सवाल भाजपा की छवि को नुकसान पहुंचा सकते हैं। जिस तरह से पार्टी कार्यकर्ताओं के असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं, उससे आगामी चुनावों में इसका असर देखने को मिल सकता है।
— लाडली बहनाओं के भरोसे पार लगी नैया, लेकिन कार्यकर्ताओं में नाराजगी–
सूत्रों के मुताबिक, हाल के चुनावों में लाडली बहना योजना ने भाजपा को फायदा पहुंचाया, लेकिन संगठन में कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ती नाराजगी पार्टी के लिए चुनौती बन सकती है। वरिष्ठ नेताओं को चाहिए कि वे इस विवाद को समय रहते सुलझाएं, ताकि संगठन में भरोसा कायम रहे।

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