*ईरान में मारी गई 165 बेटियों के लिए हमारी आंखों के आंसू क्यों सूख गए?*

फोटो कैप्शन: – ये कब्रिस्तान की दिल दहला देने वाली तस्वीर जिस तस्वीर को देख मानवता इंसानियत सद्भावना शर्मसार हो गई

आखिर बेतुके दुनिया को बेवजह संकट में डालने वाले इस युद्ध में निरीह बेकसूर 165 बेटियों की मौत पर मातम और शोक क्यों नहीं है? स्कूल में अध्ययन कर रही इन बेटियों का क्या कसूर था सिर्फ़ इतना कि वे ईरान देश की बेटियां थी ?क्यों नहीं हमारी सरकारों ने अफसोस जाहिर किया? क्यों नहीं अयातुल्ला खुमैनी की हत्या पर अफसोस न जाहिर करने पर हल्ला मचाने वाले इन तथाकथित धर्म निरपेक्ष राजनैतिक दलों ने बेटियों की मौत पर हल्ला मचाया? क्यों नहीं सड़कों पर सुप्रीम लीडर के शोक में काले कपड़े पहने मातम मनाते सड़कों पर धर्म को मानने वाले लोग सड़कों पर उतर नहीं पाएं? क्यों नहीं मेरे समाजसेवक इन बेटियों की मौत पर मोमबत्ती हाथ में लिए मार्च निकाल पाएं? सिर्फ यह सब इसलिए कि वे बेटियां हमारे देश की नहीं दूसरे देश की बेटियां थी? सिर्फ इसलिए कि वे हमारे धर्म को नहीं दूसरे धर्म को मानने वाली थी,? सिर्फ इसलिए कि उनके वेशभूषा हमारी वेशभूषा से मेल नहीं खाती थी? सिर्फ इसलिए कि वे हमारी बोली नहीं दूसरी बोली को बोलने वाली बेटियां थी?हम सिर्फ इसलिए चुप रह गए कि कही सत्ता संगठन हमसे नाराज न हो जाएं, बस इस डर से हम सबने चुप्पी साध ली। किसी को अल्पसंख्यक वोटों की चिंता सताने लगी तो किसी को बहुसंख्यक वोटों को लुभाने का अवसर हाथ से नहीं निकल जाएं बस इसी उधेड़ बुन में मासूम बेटियों को भूला दिया गया। आखिर क्या कारण की इन बेटियों की मौत न फातिमा पढ़ा जा सका, न गीता के अठारहवां अध्याय का पाठ हुआ, न गिरिजाघर में बाइबिल के साथ प्रार्थना सभा आयोजित हुई,न रमजान के महीने में एक उपवास इन बेटियों के नाम से हम रख सके? न गुरद्वारों में गुरुग्रंथ साहब का पाठ इन बेटियों के लिए अरदास के रूप में रखा जा सका? आखिर इन बेटियों के भी जीवन में अपने सपने होंगे, ये बेटियां भी आसमान की ऊंचाइयों पर उड़ना चाहती होगी? ये बेटियां भी पढ़कर अपने परिवार की देश की सेवा करना चाहती होगी।आखिर मेरे देश के धर्मों, नागरिकों ने ऐसा सौतेला व्यवहार इन मासूम बेटियों के साथ क्यों किया? मेरा देश तो सभी को अपना परिवार मानता है तो फिर परिवार में हुई इन बेटियों की मौत पर कैंडल मार्च, शांति पाठ, प्रार्थना सभा, श्रद्धांजलि के कार्यक्रम किधर है? बेटियों को खत्म कर दिया और हम सिर झुकाकर यह कत्लेआम स्वीकार करते रहे , सत्ता को ,विचारधारा को, वोटरों को हम नाराज नहीं कर सकते ,इसलिए मूक दर्शक बन इन बेटियों की हत्याओं को भी मूकदर्शक बन जायज़ ठहरा बैठे? कंहा है यू एन ओ ।यू एन ओ केवल चाय नाश्ते भाषण देने की संस्था बनकर रह गई है,जिसके वजूद का उसे स्वय ही पता नहीं कि वह कोई संस्था है भी या नहीं? अपने दफ्तर के सामने सब देशों के झंडे फहराने से, भाषणों को देने से युद्ध नहीं रोके जा सकते बेकसूर बेटियों की जान नहीं बचाई जा सकती हैं? कहा है राजनैतिक दलों के महिला मोर्चे जो नारी की शक्ति की बात करते करते थकते नहीं? सब अंतर्ध्यान हो गये? सरकारों को तो जैसे सांप सुंघ गया होगा इस जघन्य हत्याकांड पर बोलती नहीं फूट रही? 165 बेटियों के खून से रंगे हाथ दुनिया में राष्ट्रपति प्रधानमंत्री कहलाते हैं, सुप्रीम लीडर का मारा जाना शहादत कहलाता है और इन बेटियों की मौत पर दुनिया का मूकदर्शक बने रहने को हम क्या कहेंगे?कायरता । क्रूर मानसिकता का नंगा नाच ।फिर भी मानवता इंसानियत चुप। माना युद्ध है लेकिन क्या मासूम बेटियां उस युद्ध की बलि चढ़ा दी जाएं इसे कौनसा धर्मयुद्ध कहा जा सकता हैं? यह युद्ध कौनसा राष्ट्र की सीमाओं की रक्षा के लिए लड़ा जा रहा हैं? शुद्ध व्यवसाय की दृष्टि से गुंडागर्दी से लड़ा जाने वाला युद्ध।सेना के भेष में हथियारों का इस्तेमाल के अलावा और कुछ नहीं ,जिसकी भेट मेरी इस दुनिया की खिलखिलाती 165 बेटियों की बलि चढ़ा दी गई।किधर है मानवाधिकार संगठन?

बेटियां कही की भी हो , किसी भी देश की हो , किसी भी धर्म की हो , मासूम बेटियों की हत्या को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता हैं? इस कृत्य की जितनी भर्त्सना की जाए कम है, इन बेटियों के कदमों में श्रद्धा सुमन अर्पित है।

हेमंत चंद्र दुबे बबलू

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