धरती मां, नदी मां , गौ मां, प्रकृति मां के आरक्षण विधेयक किधर है?
आखिर ये भी तो नारी है।।

यह मां माचना मृत हो गई है क्या केवल एक या दो नागरिकों की जिम्मेदारी है इसे जीवित रखने की? क्या नगर पालिका केवल इसे हटाने के लिए ठेके देते रहेगी? क्या राजनेता, जन प्रतिनिधि इनके प्राण बचाने के लिए कोई आरक्षण विधेयक संसद, विधानसभा में लाएंगे? यह भी तो नारी है, इसका नदी वंदन बिल किधर है? इसका धरती मां वंदन बिल किधर है? इसका गौ मां संशोधन विधेयक किधर है? प्रकृति मां को बचाने के लिए वंदन अभिनन्दन विधेयक किधर हैं?
बस इन माताओं के साथ समस्या यह है ये वोट नहीं दे सकती है और न दिलवा सकती हैं, न चिल्ला सकती है, न आंदोलन कर सकती है? न संसद, विधायक, नगर पालिका अध्यक्ष, पार्षद बन सकती हैं और न बनवा सकती है! इसलिए एजेंडे से बाहर है? कल जितनी बहने नारी वंदन बिल के लिए इकट्ठी हुई थी, उतनी मां माचना नदी के किनारे तटों पर एकत्रित हो जाती और मां के प्राण बचाने के लिए आगे आ जाती तो यह देश की संस्कृति, संस्कार धर्म सब बच जाता? लेकिन नहीं हमे तो पदों की चिंता सता रही है, अधिकारों की बात हो रही हैं, पार्टियों को वोट दिलवाने की फिक्र हो रही हैं,लेकिन सीता मां की मां धरती मां मर रही हैं , भोलेनाथ की गंगा दम तोड़ रही हैं , गौ मां नित्य पॉलीथिन प्लास्टिक डिस्पोजल खाकर मृत हो रही हैं, घर में बैठी स्वयं नारी शक्ति कैंसर से तड़प तड़प कर मर रही हैं लेकिन हमें नारी शक्ति वंदन आरक्षण संशोधन विधेयक की चिंता हो रही है।
धरती, नदी, गौ प्रकृति यह सब भी तो नारी है इनके लिए कौनसा आरक्षण संशोधन विधेयक है? बस ये राजनीति नहीं कर सकती हैं, वोट नहीं दिलवा सकती है, न वोट डाल सकती है, इनके पक्ष में कोई नहीं सब विपक्ष में खड़े है, इनकी सरेआम हत्या की जा रही हैं। सब मौन है, सब चुप है क्योंकि ये वोट पाने का साधन नहीं? नारी को संसद में आरक्षण मिल भी गया लेकिन ये धरती मां, नदी मां, गौ मां , प्रकृति मां मर गई या मर चुकी है तो इस आरक्षण को लेकर क्या मिलेगा? क्या हासिल होगा? मातृ शक्ति नारी शक्ति को तो आगे आना था और इन राजनैतिक दलों से कहना था कि हमें आरक्षण नहीं चाहिए पहले धरती मां, नदी मां, गौ मां प्रकृति मां को बचाने के लिए आरक्षण संशोधन विधेयक संसद विधानसभा में लाया जाए इन्हें जीवित इंसान का दर्जा दिया जाए ताकि इनके हत्यारों को उनके किए की सजा मिल सके।
नारी को आगे आना होगा और धरती नदी गौ प्रकृति के प्राण बचाने होंगे अन्यथा इस देश की सभ्यता, संस्कृति, मानवता खत्म हो जाएगी।
हेमंत चंद्र दुबे बबलू




