अब भी अनसुनी है पुरुषों की आवाज? लेखक – डॉ. संदीप गोहे, मनोवैज्ञानिक एवं पुरुष अधिकार कार्यकर्ता (एमआरए)

भारतीय समाज में वर्षों से महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण को लेकर कई कानून बनाए गए हैं। यह जरूरी भी था, क्योंकि लंबे समय तक महिलाएं शोषण और अन्याय का शिकार रही हैं। लेकिन जैसे-जैसे समय बदला, इन कानूनों का इस्तेमाल कुछ मामलों में हथियार की तरह होने लगा। आज की सच्चाई यह है कि कई पुरुष ऐसे कानूनों के दुरुपयोग का शिकार हो रहे हैं, जहां उनके पास अपनी बेगुनाही साबित करने से पहले ही समाज उन्हें दोषी मान लेता है।

हाल ही में इंदौर का चर्चित सोनम-राजा केस सुर्खियों में रहा। शादी के कुछ ही समय बाद राजा की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो जाती है और आरोप उसकी पत्नी और उसके प्रेमी पर लगते हैं। यह हत्या एक भावनात्मक धोखे की त्रासदी है। सवाल यह है कि क्या समाज ने कभी इस घटना को उस गंभीरता से देखा, जैसी वह किसी महिला पीड़िता के मामले में देखता?

यह कोई अकेला मामला नहीं है। हर साल हजारों पुरुष घरेलू हिंसा अधिनियम, दुराचार जैसे कानूनों के तहत झूठे मामलों में फंसाए जाते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े कहते हैं कि दहेज प्रकरण में दर्ज 80 प्रतिशत से अधिक मामलों में आरोपी दोषी साबित नहीं हुए। बावजूद इसके, आरोप लगते ही बिना जांच गिरफ्तारियां, थानों और कोर्ट-कचहरियों के चक्कर, और सबसे बड़ी सजा समाज की बेरुखी। ऐसे मामलों में पुरुष कानूनी उलझनों से जूझते हुए मानसिक रूप से टूट जाते हैं। अवसाद, आत्महत्या के विचार, सामाजिक बहिष्कार और परिवार के लोगों की बेइज्जती ये सब कुछ झेलना पड़ता है। माता-पिता और बहनें भी समाज की नजरों में कटघरे में खड़ी हो जाती हैं। इन हालातों में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पुरुषों के लिए भी कोई संवैधानिक सहारा है? क्या उनके लिए कोई आयोग, कोई हेल्पलाइन या कोई काउंसलिंग सेंटर मौजूद है जो उनकी बात सुने? नहीं। देश में आज भी पुरुषों की समस्याओं को लेकर एक राष्ट्रीय मंच नहीं है। अब समय आ गया है जब इस एकतरफा सोच और कानून व्यवस्था पर पुनर्विचार किया जाए। यदि किसी महिला के झूठे आरोपों से कोई निर्दोष पुरुष अपनी नौकरी, सम्मान और जीवन तक खो देता है, तो उस महिला पर भी सख्त कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए। साथ ही यह भी जरूरी है कि सभी कानून लिंग-निरपेक्ष हों, ताकि न्याय केवल एक पक्षीय न रहे। एक राष्ट्रीय पुरुष आयोग का गठन किया जाना चाहिए, जो ऐसे मामलों की सुनवाई करे। पुरुषों के लिए परामर्श केंद्र, हेल्पलाइन और पुनर्वास योजनाएं चलाई जानी चाहिए। साथ ही, मीडिया को भी अपनी भूमिका निष्पक्ष ढंग से निभानी होगी, ताकि सच को दबाया न जा सके। अब वह समय है जब यह समझा जाए कि हर पुरुष अपराधी नहीं और हर महिला पीड़िता नहीं। समाज को संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा। पुरुषों की चुप्पी को उनकी सहमति समझ लेना बहुत बड़ी भूल है। उन्हें भी सुरक्षा, सम्मान और न्याय की समान आवश्यकता है। अगर आज हम इस असंतुलन को नहीं पहचान पाए, तो आने वाले समय में पुरुषों का भरोसा सिस्टम से उठ जाएगा, समाज की न्याय व्यवस्था भी सवालों के घेरे में आ जाएगी।

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