गांधी चौक अवश्य विकसित हो लेकिन गांधी के पवित्र पदचिन्ह अमिट रहे

समय की आवश्यकता के अनुसार बाजारों को व्यवस्थित भी करना होगा, विकसित भी करना होगा साथ ,आम नागरिक की रोजी रोटी से खिलवाड़ भी न हो और उस स्थान के ऐतिहासिक स्वर्णिम यादों से भी छेड़खानी न हो , यही सभी को सोचना होगा, काम करना होगा, बीच की कोई सुंदर सार्थक पहल और प्रयास करना होगा, जिसके लिए बैतूल सक्षम है।
निश्चित ही बैतूल में बाजारों में वाहनों को न खड़े कर पाने के लिए पार्किंग की व्यवस्था न होना पाना एक विकराल समस्या का रूप धारण कर चुकी हैं , जिससे सीधे सीधे व्यवसाय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा हैं , बाजारों में वाहनों के बेतरतीब खड़े होने से आम खरीददार नागरिक बाजार जाना पसंद नहीं करता है । निश्चित ही इस दिशा में प्रयास करने होंगे, विकल्पों को ढूंढना होगा उस पर कार्य करना होगा, लेकिन इसका कदापि यह अर्थ नहीं है ऐतिहासिक धरोहरों के मूल स्वरूपों के साथ छेड़खानी की जाए ? उसे बिना छेड़े भी विकास के निर्माण कराए जा सकते हैं। आज गांधी चौक की ऐतिहासिक घटनाएं आंखों में बरबस ही तैर गई जो पूर्वजों की मुँह से सुनी थी और स्वतंत्रता के स्वर्णिम इतिहास के पन्नों में पढ़ी थी।
यह स्थान निश्चित ही बैतूल से देश की आजादी का वह स्थल है जंहा से जंगल सत्याग्रह आंदोलन ने जन्म लिया साथ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी अपनी भारत यात्रा के दौरान मध्यप्रदेश में महाराष्ट्र से खेड़ी प्रवेश करते हुए बैतूल के इसी स्थान पर आकर 30 नवंबर 1933 को बैतूल वासियों को संबोधित कर देश की आजादी की लौ प्रज्वलित की थी और बैतूल के उस समय के तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष, विद्वान अधिवक्ता स्व श्री रामदयाल खंडेलवाल ने उनका नागरिक अभिनंदन करते हुए अभिनंदन पत्र का वाचन किया था तत्पश्चात वे अति भावुक हो महात्मा गांधी के अभिनंदन पत्र को सौंपे बिना ही मंच से नीचे उतर गए, तब गांधी जी बड़े ही सुंदर अंदाज में कहा रामदयाल मेरा अभिनंदन पत्र तो दे दो,रामदयाल जी वापस आए और बैतूल की जनता की ओर से वह अभिनंदन पत्र सम्मानपूर्वक गांधी जी को सौंपा , यह वह दिन था जिस दिन से मरते दम तक रामदयाल जी गांधी टोपी लगाकर ही घर से बाहर गांधी जी के सम्मान में निकलते थे, न्यायालय में भी वे गांधी टोपी लगाकर ही जिरह करते थे।
22 अगस्त 1942 को जंगल सत्याग्रह के पांच हजार से अधिक आंदोलकारियों ने स्वतंत्रता संग्राम सैनानी दीपचंद गोठी जी के नेतृत्व रानीपुर जंगल की ओर कूच किया था, जो आंदोलन रानीपुर पहुंचते पहुंचते उग्र हो उठा, धारा कोख स्टेशन आग के हवाले कर दिया गया सैकडो आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया, पुलिस गोली चालान में हमारे कई आदिवासी वनवासी बंधुओं ने देश के लिए प्राण न्योछावर कर दिये।
यह गांधी चौक मात्र काेई चौक नहीं है बल्कि हमारे स्वतंत्रता आंदोलन की आत्मा इस चौक में बसती हैं , इसलिए सब कुछ किया जाएं लेकिन गांधी चौक की आत्मा को नहीं मारा जाए और एक बात और कहना चाहूंगा कि गांधी चौक पर उस अशोक चक्र स्तंभ पर थैलियों को लटकाते और गांधी जी प्रतिमा के चबूतरे , अशोक चक्र के आधार से पाल पल्लो की रस्सियों को कसते यह शहर वर्षों से देख रहा है, तो थोड़ी गांधी के और स्वतंत्रता आंदोलन के सम्मान की चिंता हमे भी करनी आनी चाहिए। पाल पल्लो की आड़ में गांधी जी को बीच में लाना उचित नहीं है।
हा यह अवश्य उस स्थान की ऐतिहासिकता से छेड़खानी नहीं होनी चाहिए उसकी गरिमा को बनाए रखा जाना चाहिए , साथ शहर की वाहन पार्किंग के लिए आवश्यकता के मुताबिक विकास के कार्यों को गति दी जाना चाहिए क्योंकि वह शहरों के बढ़ते दबावों के लिए आवश्यक है, छोटे व्यापारी रोजी रोटी से हाथ न धो बैठे उनके उचित विस्थापन की चिंता करना शासन की प्राथमिकता होनी चाहिए।
गांधी जयंती पर तो सरकारी कार्यक्रम का आयोजन ,15 अगस्त 26 जनवरी पर कांग्रेस संगठन के द्वारा वर्षों से झंडा वंदन अवश्य वहां की अति पुरानी और स्वस्थ परंपरा रही है लेकिन इन तीन दिनों के अलावा यह भी उतना ही सच है कि वहां से धुल झटकने की भी किसी को फुर्सत नहीं मिलती है ,30 जनवरी वहां आस पास का नागरिक व्यापारी शहीदी दिवस पर आकर कोई दो मिनट का मौन रखने का समय नहीं निकाल पाता है , अशोक चक्र स्तंभ पर फूल चढ़ाने के स्थान पर थैलियों को टांगने की परंपरा उतनी ही पुरानी है , जितनी दूसरी स्वस्थ परम्पराए।
गांधी चौक विकसित हो क्योंकि गांधी चौक में नहीं नागरिकों की आत्मा में बसते है जिसकी गरिमा कायम रहनी चाहिए,जिसमें स्वतंत्रता संग्राम के हर बलिदानी की कहानी बसती है, विकास की भेट न चढ़े इसका विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। सत्ता आयेगी जाएगी, बाजार बनेंगे बिगड़े, दुकानें लगेगी हटेगी, विकास होगा नहीं होगा ,आरोप प्रत्यारोप होते रहेंगे,शब्दों के तीर चलते रहेंगे ,नहीं चलेंगे , नेता चुनाव हारेंगे जीतेंगे,लेकिन गांधी चौक की नागरिकों में बसती आत्मा नहीं मरनी चाहिए, जिसमें हमारे पूर्वजों की वह खुशबू बसती है जो हमारे जीवन की प्रेरणा है। वह अमिट रहनी चाहिए, क्योंकि उसी से हम है जिसे आजाद भारत कहा जाता हैं , लेकिन उसे व्यवस्थित,सुंदर , मजबूत बनाना भी हम सभी नागरिकों का, सरकार का कर्तव्य और दायित्व हैं,।

गांधी चौक पर अनेको बार सफाई करने के बाद 75 कदम के साथी _हेमंत चंद्र दुबे बबलू




