विभीषण रुपी जीव का कल्याण हनुमान जैसे सद्गुरु से ही संभव है: पं निर्मल कुमार शुक्ल।

श्री हनुमत कथा महोत्सव षष्ठम दिवस।

बैतूल। हमारी इच्छाओं का समूह ही लंका नगर है जहां कामनाओं की भरमार है। इसका राजा रावण है जो कि मूर्ति मान मोह है, रावण को दस सिर हैं याने दशों दिशाओं में जितना भी भोग सुलभ है सब इसे चाहिए जिसे भोगों से संतुष्टि न हो दसों इंद्रियों से जो निरंतर भोग पाना चाहता है वही दशानन है। इस लंका नगर में भक्त विभीषण का निवास होता है। विभीषण की समस्या यह है कि वो नाम तो राम का लेते हैं किन्तु सेवा रावण की करते हैं। उन्होंने रावण को अपना भाई मानकर उसके कल्याण को ही अपना कर्तव्य मान लिया है। हनुमान जी विभीषण को लंका से निकाल कर रामादल में लाना चाहते हैं सीता खोज तो एक बहाना है वस्तुतः खोजना तो विभीषण को है।नौ दिवसीय श्री हनुमत कथा महोत्सव के छठें दिवस की कथा में मानस महारथी पं निर्मल कुमार शुक्ल जी ने उक्त उद्गार व्यक्त किए। आपने कहा भगवान श्री राम विभीषण के लंका में रहते हुए रावण को नहीं मार सकते क्योंकि जिस पर एक भजनानंदी संत का वरद हस्त हो उसे मारना बहुत कठिन होता है। हस्तिनापुर में जब तक संत विदुर जी बैठ कर भजन करते रहेंगे तब तक दुर्योधन अजेय बना रहेगा इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण स्वयं दूत बनकर हस्तिनापुर गये दुर्योधन का निमंत्रण ठुकरा कर विदुर के घर भोजन करके दुर्योधन और विदुर में भेद उत्पन्न करा दिया। परिणाम स्वरूप दुर्योधन ने अपमानित करके विदुर जी को घर से बाहर भगा दिया भागवत में वर्णन है जब विदुर जी गये तो अपने साथ कौरवों का पुण्य भी लेते गये और दुर्योधन के विनाश का शुभारंभ हो गया। उसी प्रकार विभीषण जब तक लंका में बैठकर भजन करते रहेंगे तब तक लंका निवासी अजेय बने रहेंगे क्योंकि भगवान का नियम है। प्रणत कुटुम्ब पाल रघुराई। भगवान अपने भक्तों के सारे परिवार की रक्षा करते हैं। न मे भक्तः प्रणस्यति। अर्थात मेरे भक्त और उसके परिवार का नाश नहीं होता। हनुमान जी ने लंका जाकर विभीषण को समझाया कि तुम रावण याने मोह के भाई नहीं हो जीव के सच्चे भाई तो भगवान हैं इसीलिए उन्हें दीन बंधु कहा जाता है। विभीषण को संकोच है कि मैं राक्षस वंश में उत्पन्न हुआ राम मुझे कैसे स्वीकार करेंगे तो हनुमान ने अपना उदाहरण दिया कि आप तो पुलस्त्य ऋषि के नाती हैं मेरी ओर देखो मैं जाति का वानर जो जन्मजात चंचल होता है। अशुभ इतना कि सबेरे सबेरे अगर कोई मेरा नाम ले ले तो दिन भर उसे भोजन न मिले। प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिले आहारा। किंतु इतने अधम को भी भगवान ने अपने ह्रदय से लगाकर अपना बना लिया।आप राम का नाम तो लेते हैं लेकिन काम रावण का करते हैं बस विभीषण का मनोबल बढ़ गया। उधर जब रावण ने हनुमान को मारने का आदेश दिया तो विभीषण ने कहा नीति विरोध न मारिय दूता। और हनुमान की रक्षा कर लिया हनुमानजी ने भी सारी लंका तो जला दिया पर विभीषण की झोपड़ी नहीं जलाए। रावण को लगा कि विभीषण ने वानर का प्राण बचाया वानर ने उसका मकान बचा लिया बस भेद पैदा हो गया। जब विभीषण ने सीता वापस करने का हठ किया तो रावण ने चरण प्रहार करके उसे घर से बाहर निकाल दिया। उसी समय रावण के सर्वनाश का आरंभ हो गया। रावण जबहिं विभीषण त्यागा।भयउ विभव बिन तबहिं अभागा। क्यूं हीन भये सब तबहीं। बस लंका की दुर्गति प्रारंभ हो गई। यह कथा गंगा 27 मार्च तक दोपहर 3 से 6 बजे तक प्रवाहित होगी। संगीता अवस्थी, राजेश अवस्थी, प्रमोद अवस्थी और शोभित अवस्थी ने सभी क्षेत्रीय श्रद्धालु जनों से अधिकाधिक संख्या में उपस्थित होकर कथामृत पान करने का आग्रह किया है।

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