मुद्रा लोन डिफॉल्ट पर बढ़े धारा 138 के केस।

कोविड, दुर्घटना और आपदाओं से ठप हुए कारोबार। सुरक्षा चेक और वास्तविक देनदारी बने अहम बचाव।

बैतूल। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत बिना गारंटी दिए गए ऋण अब कई छोटे उद्यमियों के लिए कानूनी संकट बनते जा रहे हैं। कोविड-19 महामारी, सड़क दुर्घटनाओं और अन्य आपदाओं के कारण कारोबार ठप होने से बड़ी संख्या में ऋणी किश्तें नहीं चुका पाए, जिसके चलते बैंकों ने परक्राम्य लिखत अधिनियम 1881 की धारा 138 के तहत चेक बाउंस के आपराधिक मामले दर्ज करना शुरू कर दिया है। जिला न्यायालय बैतूल के अधिवक्ता भारत सेन ने ऐसे मामलों में आरोपियों को घबराने के बजाय कानूनी प्रावधानों को समझने की सलाह दी है।

उन्होंने बताया कि धारा 138 के मामलों में आरोपी के पास कई मजबूत बचाव उपलब्ध हैं। यदि बैंक द्वारा लिया गया चेक केवल सुरक्षा के रूप में था और किसी वर्तमान देनदारी के भुगतान हेतु जारी नहीं किया गया था, तो यह महत्वपूर्ण बचाव बन सकता है। इसके अलावा, कोविड-19 जैसी आपदा के कारण अनुबंध का पालन असंभव होने की स्थिति में भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 56 के तहत ‘डॉक्ट्रिन ऑफ फ्रस्ट्रेशन’ लागू हो सकती है। साथ ही यदि चेक में भरी गई राशि वास्तविक बकाया से अधिक है, तो मामला तकनीकी आधार पर कमजोर हो सकता है।

मुद्रा ऋणों पर लागू सी जी एफ एम यू गारंटी को लेकर भी महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है। इस योजना के तहत ऋण डिफॉल्ट होने पर सरकार बैंक को 75 से 80 प्रतिशत तक राशि का भुगतान करती है। ऐसे में यदि बैंक यह राशि प्राप्त कर चुका है, तो पूर्ण राशि के लिए आपराधिक कार्यवाही पर सवाल उठ सकता है। अधिवक्ता ने जिरह के दौरान इस तथ्य को सामने लाने की सलाह दी है।

इसके अलावा भारतीय रिजर्व बैंक के एमएसएमई पुनर्गठन दिशानिर्देशों का पालन न करना भी बैंकों की प्रक्रियात्मक कमी माना जा सकता है। नियमों के अनुसार संकटग्रस्त सूक्ष्म इकाइयों को सीधे कोर्ट में ले जाने से पहले पुनर्गठन का अवसर दिया जाना चाहिए।

आरोपी उद्यमियों को नोटिस मिलने पर 15 दिनों के भीतर जवाब देने, आपदा से संबंधित प्रमाण प्रस्तुत करने और नेशनल लोक अदालत में वन टाइम सेटलमेंट के विकल्प पर विचार करने की सलाह दी गई है। न्यायालय आरोपी की मंशा को भी महत्व देता है, इसलिए आंशिक भुगतान कर ईमानदार प्रयास दिखाना लाभकारी हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि उचित कानूनी मार्गदर्शन और दस्तावेजों के आधार पर ऐसे मामलों में राहत संभव है और प्रभावित उद्यमी सम्मानपूर्वक समाधान पा सकते हैं।

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