राठीपुर नाटक मंडल ने जीता जिला स्तरीय नाटक मंचन प्रतियोगिता का प्रथम पुरस्कार।

सोंडिया में जीवंत हुई रामायण-महाभारत की कथाएं, राठीपुर रहा अव्वल।

बैतूल। मुलताई तहसील के ग्राम सोंडिया में आयोजित जिला स्तरीय क्षेत्रीय नाटक मंचन प्रतियोगिता में बैतूल तहसील के राठीपुर नाटक मंडल ने लक्ष्मण शक्ति मेघनाद वध की शानदार प्रस्तुति देकर प्रथम पुरस्कार अपने नाम किया। छह दिनों तक चले इस सांस्कृतिक महोत्सव में रामायण और महाभारत आधारित नाटकों के जीवंत मंचन ने हजारों दर्शकों को देर रात तक बांधे रखा।

ग्राम पंचायत सरपंच जयप्रकाश रघुवंशी और शिक्षक नारायण सिंह नगदे ने बताया कि भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर रामलीला और महाभारत आज भी समाज में जीवंत हैं। रघुवंशी समाज जिला नाटक मंडल समिति के संरक्षण में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाली यह प्रतियोगिता जिले की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है। पूर्व जिलाध्यक्ष कोमल सिंह रघुवंशी और हरि सिंह नगदे ने बताया कि 20 मई से 27 मई 2026 तक ग्राम सोंडिया में प्रतियोगिता का भव्य आयोजन किया गया, जहां प्रतिदिन रात 9 बजे से 2:30 बजे तक दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ती रही।

– छह मंडलों ने प्रस्तुत किए यादगार नाटक

वरिष्ठ कलाकार श्रीलाल नगदे और लक्खू सिंह रघुवंशी ने बताया कि प्रतियोगिता में छह नाटक मंडलों ने भाग लिया। सेन्द्रया मंडल ने अभिमन्यु संग्राम एवं स्वर्गवास, छिन्दी मंडल ने मोरध्वज, चिखलीकला मंडल ने सरवर नीर, माथनी मंडल ने सत्यवादी हरिश्चंद्र, मोरखा मंडल ने कृष्ण-अर्जुन संग्राम” तथा राठीपुर मंडल ने लक्ष्मण शक्ति मेघनाद वध का मंचन किया। गायन, संवाद, अभिनय, झांकियों और वाद्ययंत्रों के साथ प्रस्तुत नाटकों ने दर्शकों को रामानंद सागर के प्रसिद्ध धारावाहिकों की याद दिला दी।

– निर्णायकों ने किया सूक्ष्म मूल्यांकन

ग्राम अध्यक्ष धनलाल चौधरी और ग्राम प्रमुख रूप सिंह नगदे ने बताया कि पांच सदस्यीय निर्णायक मंडल ने सभी प्रस्तुतियों का बारीकी से मूल्यांकन किया। प्रतियोगिता में राठीपुर मंडल को प्रथम पुरस्कार स्वरूप 9051 रुपये, प्रशस्ति पत्र और स्मृति चिन्ह प्रदान किया गया। मेघनाद, राम, लक्ष्मण, रावण और हनुमान सहित सभी पात्रों के प्रभावशाली अभिनय ने निर्णायकों और दर्शकों को प्रभावित किया। विशेष बात यह रही कि 10 वर्ष से लेकर 90 वर्ष तक की आयु के कलाकारों ने मंच पर अपनी प्रतिभा का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।

– माथनी और मोरखा मंडल भी रहे सम्मानित

प्रतियोगिता में माथनी नाटक मंडल की सत्यवादी हरिश्चंद्र प्रस्तुति को द्वितीय स्थान मिला, जिसके लिए मंडल को 8051 रुपये, प्रशस्ति पत्र और स्मृति चिन्ह प्रदान किए गए। वहीं मोरखा नाटक मंडल की कृष्ण-अर्जुन संग्राम प्रस्तुति को तृतीय पुरस्कार के रूप में 7051 रुपये, प्रशस्ति पत्र और स्मृति चिन्ह दिए गए। चिखलीकला, छिन्दी और सेन्द्रया नाटक मंडलों को सांत्वना पुरस्कार स्वरूप 5051 रुपये, प्रशस्ति पत्र और स्मृति चिन्ह प्रदान किए गए।

– स्मृतियों को समर्पित रहा पुरस्कार वितरण

प्रतियोगिता के पुरस्कार स्वर्गीय सुमरण सिंह पटेल, स्वर्गीय शिवराज सिंह पटेल और स्वर्गीय लालसिंह पटेल की स्मृति में उनके पुत्र नरेंद्र सिंह नगदे, सुभाष सिंह रघुवंशी और शीतल सिंह रघुवंशी के विशेष सहयोग से वितरित किए गए। आयोजक चन्द्रकिशोर सिंह रघुवंशी और ठुमरू सिंह रघुवंशी ने बताया कि जिला नाटक मंडल समिति बैतूल, जिला रघुवंशी समाज सेवा समिति, जिला युवा संगठन रघुवंशी समाज, नोबल हॉस्पिटल भोपाल तथा विरासत समिति बैतूल ने भी अतिरिक्त ट्रॉफियां और नगद पुरस्कार प्रदान किए।

– सभी के सहयोग से बना ऐतिहासिक आयोजन

इन्द्रे सिंह और ईश्वर चौधरी ने बताया कि आयोजन की सफलता में निर्णायक समिति के सदस्य श्रीलाल नगदे, नरेंद्र सिंह नगदे, पंजाब सिंह नगदे, कमलेश सिंह रघुवंशी, हरि सिंह नगदे तथा समस्त ग्रामवासियों, कर्मचारियों और कलाकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। कार्यक्रम में नाटक मंडल अध्यक्ष रेखन सिंह ठाकुर, समाज अध्यक्ष श्रीराम किशोर चौधरी, कार्यकारी अध्यक्ष विजय सिंह चौधरी, पूर्व जिलाध्यक्ष बलराम सिंह अधिवक्ता, युवा अध्यक्ष अशोक सिंह रघुवंशी, जनपद पंचायत आमला उपाध्यक्ष किसन सिंह पटेल, कल्लू सिंह रघुवंशी, कुबेर सिंह तुरिया, सविंदर सिंह रघुवंशी सहित विभिन्न समितियों के पदाधिकारी और सभी प्रतिभागी मंडलों के प्रमुख उपस्थित रहे।

– आभार के साथ हुआ समापन

07 जून को आयोजित पारितोषिक वितरण समारोह में ग्राम सरपंच श्रीमती ललिता रघुवंशी, जयप्रकाश रघुवंशी तथा ग्राम मुकद्दम श्रीलाल नगदे ने सभी कलाकारों, अतिथियों, दर्शकों और सहयोगियों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन कोमल सिंह रघुवंशी, नारायण सिंह नगदे, चन्द्रकिशोर सिंह रघुवंशी, सुरेश नगदे, हरि सिंह नगदे और नरेंद्र सिंह नगदे ने किया। प्रतियोगिता ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि ग्रामीण अंचलों में भारतीय संस्कृति, लोकनाट्य और पौराणिक परंपराएं आज भी पूरे गौरव के साथ जीवित हैं।

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