जलकुंभी से जकड़ी माचना, नदी बनी दलदल।

दुर्गंध और मच्छरों से बढ़ा बीमारी का जोखिम। अनिल यादव की पहल, सफाई को जनआंदोलन बनाने की मांग।

बैतूल। जिले की जीवनदायिनी माचना नदी इन दिनों गंभीर संकट से जूझ रही है। कभी स्वच्छ बहने वाली यह नदी अब जलकुंभी की मोटी परत में पूरी तरह ढंक गई है, जिससे कई स्थानों पर पानी नजर ही नहीं आता और नदी दलदल में तब्दील होती दिख रही है।

स्थिति तब और खतरनाक हो गई है जब जलकुंभी के घने जाल में सांप, जहरीले कीड़े और अन्य विषैले जीव पनपने लगे हैं। इससे नदी किनारे रहने वाले लोगों और वहां आने-जाने वालों के लिए खतरा बढ़ गया है।

जलकुंभी के फैलाव ने जल प्रवाह को बाधित कर दिया है और पानी में घुलित ऑक्सीजन तेजी से कम हो रही है। इसके कारण मछलियों और अन्य जलीय जीवों के जीवन पर संकट गहराता जा रहा है। कई जगह पानी सड़ने लगा है, जिससे दुर्गंध फैल रही है और आसपास का वातावरण प्रभावित हो रहा है। साथ ही मच्छरों की संख्या बढ़ने से बीमारियों का खतरा भी बढ़ गया है।

इसी बीच लाडो फाउंडेशन के संस्थापक अनिल यादव ने अपने साथियों के साथ नदी से जलकुंभी हटाने का अभियान शुरू किया है। सीमित संसाधनों में चल रही यह पहल लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई है। उनका कहना है कि जलकुंभी हटाना संभव है, लेकिन इसकी तेजी से फैलने की क्षमता काम को चुनौतीपूर्ण बना देती है। एक हिस्से से हटाने के बाद यह फिर फैल जाती है।

अनिल यादव ने प्रशासन, सामाजिक संगठनों और आम जनता से मिलकर इसे जनआंदोलन बनाने की अपील की है। उधर स्थानीय लोगों में प्रशासन की अनदेखी को लेकर नाराजगी है और उन्होंने मशीनों की मदद से बड़े स्तर पर सफाई अभियान चलाने और स्थायी समाधान की मांग की है।

पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार जलकुंभी एक आक्रामक पौधा है, जो तेजी से फैलकर जल स्रोतों को खत्म कर सकता है। इसके नियंत्रण के लिए नियमित सफाई, जैविक उपाय और सतत निगरानी जरूरी है।

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