अवैध अनुबंध से उत्पन्न ऋण के चेक पर धारा 138 एन.आई. एक्ट लागू नहीं: सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण प्रथम दृष्टया अवलोकन..

लेखक: अधिवक्ता भरत सेन

जिला न्यायालय, बैतूल (मध्य प्रदेश)

न्यायालयों में चेक बाउंस के मामलों की भरमार है। धारा 138 नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 (एन.आई. एक्ट) के तहत दायर होने वाले ये मामले वाणिज्यिक लेन-देन की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। लेकिन क्या हर चेक बाउंस ही दंडनीय अपराध है? क्या अवैध या अनैतिक अनुबंध से उत्पन्न ऋण के चुकाने के लिए जारी चेक पर भी धारा 138 लागू हो सकती है?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रश्न पर अपना प्रथम दृष्टया (prima facie) अवलोकन व्यक्त किया है, जो पूरे कानूनी जगत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। केस शीर्षक के.के.डी. पांडियन बनाम एस. तमिलसेल्वी (SLP (Crl.) Diary No. 4773 of 2025) में न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति जोयमल्या बागची की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि कोई चेक **भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 23 से प्रभावित (hit by Section 23) किसी अनुबंध से उत्पन्न विवाद के समझौते के तहत जारी किया गया हो, तो वह चेक legally enforceable debt नहीं माना जाएगा। अतः ऐसे चेक के बाउंस होने पर धारा 138 एन.आई. एक्ट के अंतर्गत कार्यवाही नहीं चल सकती।

क्या है मामला?

मद्रास हाईकोर्ट (मदुरै बेंच) ने एक मामले में आरोपी को बरी कर दिया था। शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की। उन्होंने केरल हाईकोर्ट के 2015 के फैसले (C.V. Rajan Vs. Illikkal Ramesan) का हवाला देते हुए तर्क दिया कि भले ही मूल अनुबंध अवैध हो और उससे प्राप्त राशि वसूली योग्य न हो, लेकिन यदि दोनों पक्षों में समझौता हो जाता है और समझौते के तहत चेक जारी किया जाता है, तो चेक बाउंस होने पर धारा 138 की कार्यवाही चलाई जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने विलंब माफ करते हुए इस तर्क पर प्रथम दृष्टया असहमति व्यक्त की। अदालत ने कहा कि धारा 138 एन.आई. एक्ट की भाषा में legally enforceable debt or other liability शब्दों का सीधा संबंध संविदा अधिनियम की धारा 23 से है। यदि मूल अनुबंध ही अवैध, अनैतिक या सार्वजनिक नीति के विरुद्ध है, तो उससे उत्पन्न ऋण कानूनी रूप से वसूली योग्य नहीं होगा। समझौता या चेक जारी करना भी इस आधारभूत अवैधता को वैध नहीं बना सकता।

कानूनी आधार

धारा 23 भारतीय संविदा अधिनियम स्पष्ट है—जिस अनुबंध का उद्देश्य या विचार अवैध हो, वह शून्य (void) है। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि धारा 138 एन.आई. एक्ट दंडनीय प्रावधान है, इसलिए इसका दायरा संकीर्ण रखा जाना चाहिए। केवल “कानूनी रूप से वसूली योग्य ऋण” ही इस धारा के दायरे में आता है।

केरल हाईकोर्ट का 2015 वाला फैसला, जिसमें कहा गया था कि “अवैध वादे पर प्राप्त राशि चुकाने में कानून कोई रोक नहीं लगाता”, अब सुप्रीम कोर्ट की नजर में संदिग्ध है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे एन.आई. एक्ट की वैधानिक भाषा के अनुरूप नहीं माना है।

अधिवक्ताओं और वादकारों के लिए निहितार्थ

यह अवलोकन जिला न्यायालयों के अधिवक्ताओं के लिए बहुत उपयोगी है।

1. शिकायतकर्ताओं को सावधानी**: अब चेक बाउंस की शिकायत दायर करते समय मूल लेन-देन की वैधता की जांच अनिवार्य हो गई है। यदि मूल सौदा अवैध (जैसे जुआ, सट्टा, अनैतिक व्यापार आदि से संबंधित) था, तो समझौते के चेक पर भी धारा 138 का केस कमजोर हो जाएगा।

2. आरोपी पक्ष को राहत: जिन मामलों में आरोपी यह साबित कर दे कि चेक अवैध अनुबंध से जुड़े ऋण के चुकाने के लिए जारी किया गया था, तो वे धारा 138 से बच सकते हैं।

3. समझौता (Compromise) की सीमा: भले ही दोनों पक्ष आपसी समझौते से चेक जारी करें, लेकिन यदि मूल विवाद ही धारा 23 से ग्रस्त था, तो समझौता भी एन.आई. एक्ट के दायरे में सुरक्षा नहीं देगा।

4. प्रैक्टिकल सलाह: अधिवक्ताओं को अब चेक बाउंस के मामलों में केवल चेक की वापसी और नोटिस पर ही निर्भर नहीं रहना चाहिए। मूल दस्तावेज, अनुबंध और लेन-देन का पूरा चित्र अदालत के समक्ष रखना चाहिए।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह प्रथम दृष्टया अवलोकन कानून की शुद्धता और नैतिकता दोनों को मजबूत करता है। यह याद दिलाता है कि आपराधिक कानून का उपयोग वैध लेन-देन की सुरक्षा के लिए किया जाना चाहिए, न कि अवैध सौदों को वैधता देने के लिए।

जिला न्यायालय बैतूल सहित पूरे देश के अधिवक्ताओं को इस फैसले का अध्ययन करना चाहिए। आने वाले दिनों में जब यह SLP अंतिम रूप से सुनी जाएगी, तो शायद और विस्तृत दिशा-निर्देश मिलेंगे। तब तक हमें अपने मुवक्किलों को सलाह देते समय यह बात अवश्य ध्यान में रखनी होगी कि **कानून केवल वैध ऋण की ही रक्षा करता है।

अधिवक्ता भरत सेन

जिला न्यायालय, बैतूल

(मोबाइल: [98273 06273])

तारीख: 19 अप्रैल 2026

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