जिला अस्पताल के अस्तित्व पर मंडराया खतरा, अजाक्स ने जताई चिंता 

मेडिकल कॉलेज पीपीपी मोड पर खोलने के दुष्परिणाम से किया आगाह

बैतूल। अनुसूचित जनजाति बाहुल्य बैतूल जिले में जिला अस्पताल का अस्तित्व संकट में है। म.प्र. अनुसूचित जाति-जनजाति अधिकारी एवं कर्मचारी संघ (अजाक्स) ने जिला चिकित्सालय में पीपीपी मोड (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) के तहत मेडिकल कॉलेज खोले जाने के निर्णय पर कड़ी आपत्ति जताई है। अजाक्स के जिलाध्यक्ष अनिल कापसे ने जिला कलेक्टर के माध्यम से राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपते हुए इस फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की है।

पीपीपी मोड से आम जनता को यह होंगे नुकसान?

कापसे ने बताया कि पीपीपी मोड के तहत जिला अस्पताल के 500 बेडों में से 125 बेड पेमेंट और आयुष्मान योजना के तहत प्राइवेट मैनेजमेंट के अधीन हो जाएंगे, जिस पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं रहेगा। इससे सिर्फ 375 बेड आम जनता के लिए मुफ्त उपलब्ध होंगे, जो कि वर्तमान स्थिति से काफी कम है। इसके अलावा, जिला चिकित्सालय के डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ का भविष्य भी प्राइवेट मैनेजमेंट के हवाले हो जाएगा, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर गंभीर प्रभाव पड़ने की संभावना है।

सरकारी संसाधनों का प्राइवेट मैनेजमेंट के अधीन होना चिंता का विषय

ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि सरकार द्वारा मेडिकल कॉलेज के लिए जमीन, अस्पताल, बिजली, सड़क जैसी सभी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं, फिर भी मेडिकल कॉलेज को प्राइवेट मोड पर चलाने का निर्णय लिया गया है। कापसे ने कहा कि अगर सभी संसाधन शासकीय हैं, तो शासकीय मेडिकल कॉलेज खोलना ज्यादा उचित होगा, जिससे गरीब और आम जनता को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकेंगी।

एससी-एसटी विद्यार्थियों पर प्रभाव

अजाक्स महासचिव दशरथ धुर्वे ने बताया कि इस मॉडल से अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों को चिकित्सा शिक्षा और प्रशिक्षण प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। मेडिकल कॉलेज को पीपीपी मोड पर संचालित करने से छात्रों पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा, और उनके लिए शिक्षा के अवसर सीमित हो जाएंगे। ज्ञापन सौंपने के दौरान अनिल कापसे, दशरथ धुर्वे, संजीव प्रजापति, दिनेश पाटिल, और योगेश भुस्कुटे उपस्थित थे। उन्होंने मांग की कि बैतूल जिले में शासकीय मेडिकल कॉलेज ही खोला जाए ताकि आमजन और गरीब तबके को लाभ मिल सके।

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