विभिन्न युगों में अलग-अलग आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये होता रहा वाद्य यंत्रों का प्रयोग

शिक्षकों के मार्गदर्शन में छात्राओं ने वाद्य यंत्रों पर बनाए प्रोजेक्ट, जाना ध्वनि का महत्व


बैतूल। शासकीय कन्या शाला गंज की छात्राओं ने प्राचार्य ललित लाल लिल्होरे सहित अन्य शिक्षकों के मार्गदर्शन में वाद्य यंत्रों पर प्रोजेक्ट तैयार किया।छात्राओं ने वाद्य यंत्रों की ध्यनि को भी जाना। प्रभारी शिक्षक महेश गुंजेले ने बताया कि हम प्रतिदिन विभिन्न स्त्रोतों जैसे मानवों, पक्षियों, घंटियों, वाद्य यंत्रों, मशीनों, वाहनों, टेलीविजन, रेडियों आदि की ध्वनि सुनते हैं ध्वनि उर्जा का एक रूप है जो हमारे कानों में श्रवण का संवेदन उत्पन्न करती हैं। विभिन्न प्रकार के वाद्य यंत्रों को समझने और उनकी ध्वनि को समझने के उदे्श्य से छात्राओं से वाद्य यंत्रों पर प्रोजेक्ट तैयार कराए गए।
शिक्षक महेश गुंजेले ने छात्राओं को बताया कि वाद्यों का प्रयोग विभिन्न युगों में अलग-अलग आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये होता रहा है, जैसे दूर बैठे व्यक्ति को संकेत देने के लिए, जंगली जानवरों को भगाने के लिए, शिकार के समय तथा उत्सव आदि में प्रसन्नता प्रगट करने के लिए तथा युद्ध भूमि में सैनिकों का हौसला बढाने तथा आनंद प्राप्त करने के लिए वाद्य यंत्रों का उपयोग होता रहा हैं। वाद्य यंत्रों को चार भागों में बाटा गया है जिसमें तंतु वाद्य या तंत वाद्य, सुषिर वाद्य, अवन वाद्य, घन वाद्य मुख्य है। तंत वाद्य को तार वाले वाद्य के नाम से भी जाना जाता है हम अपने अंगुलियों तथा नाखूनों की मदद से बजाते है इन वाद्य यंत्रों में मुख्य रूप से वीणा, सितार, एकतारा, गिटार, आदि मुख्य है तंत वाद्य में वितंत वाद्य भी हैं जिसमें सांरगी और वायलिन मुख्य है जिन्हें धनुष के माध्यम से बजाया जाता हैं संतूर वाद्य को चम्मच के आकार के हथौड़े से प्रहार करके बजाया जाता है। सुषिर वाद्य ऐसे वाद्य होते है जिन्हे मुंह से फूंक मारकर बजाया जाता है, जैसे शंख, बांसुरी, शहनाई, सिंगी मुख्य है। हारमोनियम एक ऐसा वाद्य है जिसमें ध्वनि को उत्पन्न करने के लिए यंत्रवत् हवा को उड़ाने के लिए धौंकनी का इस्तेमाल किया जाता है। अवन वाद्य इसे खाल वाद्य भी कहा जाता है इस प्रकार के वाद्य को जानवरों की त्वचा की एक परत होती है जो ध्वनि उत्पादन में मदद करती है इन वाद्य को हथेलियो, अंगुलियों तथा लकड़ी या बांस की किमची से बजाया जाता है इस वाद्य में लकड़ी के खोल पर दोनों तरफ जानवर की खाल चढाकर बजाया जाता है जैसे ढोलक, ढोल, मांदल, टिमकी, पखावज, तबला, डमरू, बौंगो, कौंगो, ढपला, ढपली आदि मुख्य है। घन वाद्य को धातु वाद्य भी कहा जाता है यह सहयोगी वाद्य भी कहलाते है। यह धातु के बने होते है जैसे घंटा, घंटी, घुघरू, मुरचंग, मंजीरा, करताल, खंजरी, मटका आदि मुख्य हैं।

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