जाति आधारित जनगणना से लोकतंत्र मज़बूत होगा
डॉ रमेश काकोड़िया (काकू भैया) (आदिवासी कांग्रेस अध्यक्ष, जिला बैतूल)

राहुल गांधी जी ने कहा है कि जातिगत जनगणना यानी कास्ट सेंसस हिंदुस्तान का एक्स-रे है। इससे पता लग जाएगा कि देश में ओबीसी, आदिवासी और सामान्य वर्ग के कितने लोग हैं। एक बार आंकड़ा आ जाएगा तो देश सबको लेकर आगे चल पाएगा। ओबीसी महिलाओं को भागीदारी देनी है। सबको भागीदारी देनी है तो जातिगत जनगणना करानी होगी।” मैं एक डॉक्टर हूँ इसलिए सही एक्सरे का महत्व जानता हूँ। मैं खुद एक आदिवासी परिवार से आता हूँ इसलिए भारत के समाज की सच्चाई को समझता हूँ। मैंने बचपन से ही अपने गाँव और शहर में एक बड़ी समस्या देखी है। मेरे गाँव में, मेरे शहर के आसपास के शहरों में लाखों ओबीसी, दलित और आदिवासी हैं। लेकिन गाँव या शहर के चौराहों पर, पक्के बाज़ारों में बड़ी सड़कों के किनारे उनके मकान, दुकान या ज़मीनें नहीं हैं। ओबीसी के लाखों परिवार हैं, उनके पास खाने-कमाने के लिए ज़रूरी ज़मीन नहीं है। दलितों आदिवासियों के भी लाखों परिवार हैं, उनके पास ना शिक्षा है ना रोज़गार है ना ज़मीन है।
सवाल उठता है कि ये ज़मीन, ये संपत्ति और ये अवसर कहाँ चले गए? आप लोगों ने पुरानी फ़िल्मों में देखा होगा। गरीब किसान बीमारी, शादी, मृत्युभोज या पूजा पाठ के लिए कर्जा लेकर फँस जाते थे। या फिर शराब की लत में फँसकर ज़मीन गिरवी रख देते थे। अक्सर झूठे कागज दिखाकर अनाप शनाप ब्याज लगाकर उनका कर्जा बढ़ाकर दिखाया जाता था। इस तरह उनकी ज़मीनें छीन ली गयीं। इन ओबीसी, दलितों और आदिवासियों को ऊँची जाति के लोग नीच समझते आये हैं। इन्हें पढ़ने लिखने और हुनर सीखने के मौके नहीं मिले। अभी भी ज़्यादातर दलित और आदिवासी युवा आठवीं दसवीं क्लास पढ़कर स्कूल छोड़ देते हैं। इनके पास ना शिक्षा है ना हुनर है ना ज़मीन है। दूसरी तरफ़ आप अपने गाँव या शहर के चौराहे पर जाइए। आपको जितनी बड़ी दुकानें दिखेंगे वे किन लोगों की हैं? जितनी बड़ी होटलें और रेस्टोरेंट हैं वे किन लोगों के हैं? जो बड़े मकान हैं वे किन लोगों के हैं? जो बड़ी कारें और बड़े वाहन हैं वे किन लोगों के हैं? नगरपालिका से लेकर न्यायपालिका तक बड़ी कुर्सियों पर किस समाज और जातियों के लोग बैठे हैं? शहर के बड़े ठेके किन लोगों को मिलते हैं? इस पर गौर कीजिए। राहुल गांधी जी ने जो कहा है उसका मतलब साफ़ है। इस देश में सत्ता और संपत्ति की मलाई मुट्ठी भर लोग खा रहे हैं। ये हज़ारों साल से चल रहा है। जाति और वर्ण व्यवस्था ने ये ख़राबी पैदा की है। हज़ारों साल से मुट्ठी भर ऊँची जातियाँ पूरे देश कि मलाई खा रही है। अब ओबीसी इस बात को बर्दाश्त नहीं करेगा। अब दलित और आदिवासी अपना हक़ माँगेगा। इसी वजह से आज की राजनीति में भूचाल आया हुआ है। जो पार्टियाँ ऊँची जातियों के हित की राजनीति करती आई हैं। उन्हें बड़ा झटका लगा है। उन्हें समझ ही नहीं आ रहा है कि जाति जनगणना की कांग्रेस और इंडिया गठबंधन की राजनीति का जवाब कैसे दें?
दोस्तों राहुल गांधी जी ने एक और बात कही है। भारत में सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा को ख़त्म करना ज़रूरी है। मुझे लगता है कि जाति आधारित जनगणना का सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर गहरा असर पड़ेगा। सांप्रदायिक दंगे करवाने में बेरोज़गार युवाओं का इस्तेमाल किया जाता है। अगर इन युवाओं को असली मुद्दा समझ में आ गया तो हालात बदल जाएँगे। फिर वे हिंदू मुस्लिम के नाम पर लड़ने की बजाय ओबीसी दलित और आदिवासियों के शिक्षा और रोज़गार के हक के लिए लड़ना सीखेंगे। गरीबों के हक़ की लड़ाई लड़ना लोकतंत्र के लिए अच्छा होता है।
आइये इस जाति जनगणना का स्वागत कीजिए। प्रार्थना कीजिए कि मध्यप्रदेश में और केंद्र में भी कांग्रेस की सरकार बने। इसके बाद पूरे देश में जाति जनगणना के आँकड़े जारी होंगे। फिर भारत के करोड़ों ओबीसी, दलित और आदिवासियों को न्याय और सम्मान मिलेगा। भारत का लोकतंत्र मज़बूत होगा।




