fight against cancer: आजादी की लड़ाई की तर्ज पर कैंसर के खिलाफ छिड़ी जंग

समाजसेवी हेमंत चंद्र दुबे की अपील; मानवता को बचाने के लिए नोटा की बटन दबाए


बैतूल। विधानसभा चुनाव का बिगुल बजते ही कैंसर फाइटर हेमंत चंद्र दुबे के “लोकतंत्र में वोट के माध्यम से कैंसर से जंग, वोट फार नोटा” अभियान को जनमानस का समर्थन मिल रहा है। इंसान बीमारी से एक बार, लेकिन इसके खौफ से हर रोज मरता है। कैंसर भी ऐसी ही बीमारी है, जिसका खौफ आदमी को डरा देता है, उसे लगता है जिंदगी खत्म हो गई, लेकिन यह सच नहीं है, समाजसेवी हेमंत चंद्र दुबे कई ऐसे मरीजों के लिए सबक बने, जो बीमारी के नाम से घबरा कर हौसला छोड़ देते हैं। उन्होंने कैंसर को अब जड़ से खत्म करने के लिए मिशन की शुरुआत कर दी है। उनका कहना है कि जिस तरह शहीद भगत सिंह ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी, ठीक इसी तरह युवाओं को कैंसर के खिलाफ छिड़ी जंग में शामिल होकर होकर कैंसर को जड़ से खत्म करने का संकल्प लेना होगा।
— सबसे बड़ा हथियार मताधिकार–
कैंसर को जड़ से खत्म करने के लिए लोकतंत्र में मताधिकार से बड़ा कोई हथियार नहीं है। आगामी विधानसभा चुनाव में नोटा की बटन दबाकर कैंसर के खिलाफ शुरू की गई जंग में अपना योगदान देना है। उन्होंने कहा कि मैं रहूं या ना रहूं यह जंग जब तक जारी रहनी चाहिए जब तक कैंसर जड़ से खत्म ना हो जाए। इस जंग में जनमानस के पास वोट रूपी हथियार है, इसी हथियार के दम पर कैंसर से जंग जीती जाएगी। हेमंत चंद्र दुबे द्वारा अपील की जा रही है कि राजनैतिक दलों की लड़ाई से दूर कैंसर की लड़ाई में मानवता का साथ जरूरी है।
— क्या यह गंभीर विषय चुनाव का मुद्दा नहीं होना चाहिए?–
कासरगोड जिले की एक रिपोर्ट के हवाले से उन्होंने बताया कासरगोड में लगातार कई वर्षों तक एंडोसल्फान के छिड़काव के चलते वहां जन्म लेने वाले बच्चे विकृत पैदा होने लगे थे। एंडोसल्फान के उपयोग बंद होने के बाद वहां स्थिति सामान्य हो पाई। विकास की अंधी रफ्तार में खेती किसानी कीटनाशक पर निर्भर हो गई है। कीटनाशक दवाओं से कैंसर हो जाए कोई चिन्ता नहीं? देश में कितने छोटे- छोटे गोदी में खेलते बच्चे कैंसर से पीड़ित है, उनका दर्द किसी राजनैतिक दलों के नेताओं ने महसूस किया ?
— बड़े बड़े दावों के बीच मानवता को भूल बैठे नेता–
दुबे का आरोप है सरकार द्वारा कैंसर में मदद की जाती हैं, फोटो खिंचवाते हैं, अस्पताल खोले जाते है। सेवा का भाव दिखाया जाता हैं। राजनेता कैंसर में हमारी मदद करते है पर कैंसर आते ही मुंह फेर लेते हैं क्यों ? आज वोट मांगने के लिए उनके पास पर्याप्त समय निकल आयेगा। नागरिक वोट देगा बदले में सरकारी नीतियों से उसके हिस्से कैंसर आयेगा। चुनाव लड़ने और लडाने वाले किस तरह से मानवीय मुद्दे से मुंह फेर कर खड़े हुए हैं। कीटनाशक से गर्भ में पल रहे बच्चे को कैंसर हो जाएं? क्या ऐसा करके आपने अपने अधिकार का दुरुपयोग नहीं किया हैं? तो फिर नोटा की बटन उपयोगिता पर सवाल क्यों? नोटा की बटन तो मानवता की बटन है, मानवता को बचाने के लिए, नोटा की बटन दबाए।

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