जब लोग रक्तदान से डरते थे, तब शुरू हुआ अभियान; बैतूल में ऐसे आई रक्त क्रांति।
मोबाइल नहीं थे, लोग रक्तदान से भागते थे; तब शुरू हुई वह मुहिम जिसने बदल दी तस्वीर । चार किताबें, तीन फिल्में, 5 हजार लोगों का मार्च और हजारों जीवन बचाने वाला अनूठा अभियान। 30 साल पहले बोया गया बीज आज बना जीवनदायिनी ।

बैतूल। जब रक्तदान का नाम सुनकर लोग पीछे हट जाते थे, तब बैतूल के कुछ युवाओं ने मानवता की सेवा का ऐसा संकल्प लिया जिसने आगे चलकर जिले में रक्त क्रांति का रूप ले लिया। वर्ष 1995 में गर्ग कॉलोनी और रामनगर के 10 सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा शुरू किया गया मां शारदा सहायता समिति का अभियान आज हजारों लोगों की जिंदगी बचाने वाला जनआंदोलन बन चुका है। बिना किसी प्रचार-प्रसार और व्यक्तिगत पहचान की चाह के संगठन पिछले तीन दशकों से जरूरतमंदों तक रक्त पहुंचाने और समाज में रक्तदान के प्रति जागरूकता फैलाने का कार्य कर रहा है।
शारदा मंदिर गर्ग कॉलोनी से शुरू हुए इस अभियान ने वर्ष 1998 से वार्डों और गांवों में रक्त समूह परीक्षण शिविर आयोजित कर रक्तदाताओं का विशाल नेटवर्क तैयार किया। संस्था ने 6000 रक्तदाताओं की जानकारी संकलित कर ‘जीवन रक्त’ नामक पहली पुस्तक प्रकाशित की, जिसका विमोचन पूर्व विधायक शिवप्रसाद राठौर के हाथों हुआ। इसके बाद से संस्था के रक्तवीर पाढर, भोपाल, नागपुर सहित विभिन्न स्थानों पर जाकर जरूरतमंद मरीजों के लिए रक्तदान करते रहे। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आयोजित रक्तदान शिविरों के माध्यम से बड़ी संख्या में रक्त संग्रह कर मरीजों को उपलब्ध कराया गया।
– किताबों और फिल्मों से फैलाई रक्तदान की जागरूकता
रक्तदान को लेकर समाज में सकारात्मक सोच विकसित करने के लिए संस्था ने चार पुस्तकों का प्रकाशन कराया। इनमें ‘जीवन रक्त’, ‘ब्लड डायरी एक नई जिंदगी’, ‘रक्त क्रांति प्रथम’ और ‘रक्त क्रांति पार्ट-2’ शामिल हैं। इन पुस्तकों में हजारों रक्तदाताओं के नाम, मोबाइल नंबर, पते, रक्तदान संबंधी लेख, कविताएं, शतकवीर रक्तदाताओं के अनुभव तथा थैलेसीमिया और सिकल सेल पीड़ितों की पीड़ा को शामिल किया गया है।
संस्था ने रक्तदान जागरूकता पर ‘रक्तदान’, ‘रेड डोनेशन’ और ‘धूम्रपान नहीं रक्तदान करें’ नामक तीन डॉक्यूमेंट्री फिल्में भी तैयार कीं। इसके अलावा आदिवासी भाषा में रक्तदान जागरूकता गीत और मराठी भाषा में संदेश देने वाले लघु गीत तैयार कर विभिन्न क्षेत्रों में प्रसारित किए गए, जिससे बड़ी संख्या में लोग रक्तदान के लिए प्रेरित हुए।

– नवाचारों ने बनाया रक्तदान को जनभागीदारी का अभियान
रक्तदान को जनआंदोलन बनाने के लिए संस्था ने कई अभिनव प्रयोग किए। रक्त की दीवार, मिस्टर रक्तदाता बैतूल और मिस रक्तदाता बैतूल प्रतियोगिता, रक्तदान आधारित रंगोली, पोस्टर प्रदर्शनी, नाटक और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए। स्कूलों में ‘बालहठ रक्तदान की जिद’ पत्र लेखन कार्यक्रम के माध्यम से बच्चों ने अपने परिवार और समाज को सिकल सेल पीड़ितों के लिए रक्तदान करने का भावनात्मक संदेश दिया।
जन्मदिन, श्रद्धांजलि सभा और विवाह समारोह जैसे अवसरों पर रक्तदान उपहार देने की परंपरा भी शुरू की गई। संस्था ने रक्तदान को बढ़ावा देने के लिए वेबसाइट तैयार की तथा व्हाट्सएप रक्तदान समूहों के माध्यम से आज भी प्रतिदिन जरूरतमंदों को रक्त उपलब्ध कराया जा रहा है। रक्तदान के लिए हस्ताक्षर अभियान, कॉलेजों और कोचिंग संस्थानों में संगोष्ठियां तथा जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किए गए।

– पांच हजार लोगों का पैदल मार्च बना चर्चा का विषय
रक्तदान जागरूकता के लिए संस्था ने रेड कैप और रेड ड्रेस कोड के साथ आदिवासी गीत-संगीत पर आधारित विशाल पैदल मार्च निकाला, जिसमें लगभग पांच हजार लोगों ने भागीदारी की। यह अभियान जिले में रक्तदान जागरूकता का एक बड़ा उदाहरण बना।
सेवा और समर्पण की मिसाल पेश करते हुए संस्था से जुड़े चुनालोहमा निवासी मनोज कुमार आर्य और भौरा निवासी उनके भांजे पराग मालवीय पिछले 25 वर्षों से बैद्यनाथ धाम कांवर यात्रा के दौरान सुल्तानगंज से 120 किलोमीटर पैदल चलकर देवघर पहुंचते हैं और बाबा बैद्यनाथ के दर्शन के बाद शासकीय अस्पताल में रक्तदान करते हैं। वे शिर्डी, शनि शिंगणापुर, नासिक, उज्जैन तथा नेपाल स्थित पशुपतिनाथ मंदिर यात्रा के दौरान भी रक्तदान कर चुके हैं। दोनों अब तक 25 से अधिक बार रक्तदान कर चुके हैं और लोगों को यह संदेश देते हैं कि रक्तदान से किसी प्रकार की कमजोरी नहीं आती।

– सेवा का जज्बा बना संगठन की पहचान
संस्था के अनंत तिवारी और शैलेंद्र बिहारिया ने उस दौर में, जब साइकिल ही मुख्य परिवहन साधन हुआ करती थी, रायपुर के कैंसर मरीज के लिए बैतूल से पाढर तक लगभग 18 किलोमीटर साइकिल चलाकर पहुंचकर रक्तदान किया। यह सेवा भाव आज भी संस्था के कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा बना हुआ है।
मां शारदा सहायता समिति की इस रक्त क्रांति को आकार देने में स्वर्गीय ओमप्रकाश सलूजा, अतीत पवार, दीपू सलूजा, मुकेश गुप्ता, पिंकी भाटिया, रमेश भाटिया, संजय शुक्ला, महेंद्र मालवी, करण प्रजापति, हिमांशु सोनी, अनंत तिवारी, कृष्णा चौधरी, पंजाबराव गायकवाड़, ललित वाघमारे, दिलीप पवार, सुभाष चौधरी, स्वर्गीय नरेंद्र जैन, राहुल मिश्रा, कोमल बामने, पूनम धोटे, दीपा मालवीय, जगदीश किरोदे, पप्पू डांगे, विशाल मिश्रा, नवीन मिश्रा, गिरधारी मालवीय, राजेश पटने, महेश पुडें, रोहित मिश्रा, सुषमा सोनी, धीरज जोजे, राजकुमार गुप्ता, कमलेश बचले, आशीष बेले, संजय गुप्ता, रहमान खान, कोजेम खान, मोइज फकरी, प्रकाश बंजारे, संदीप सोलंकी, डॉ. सागर बिंझाड़े, निमिष मालवी, प्रीतम सिंह मरकाम और मनोहर मालवी सहित अनेक कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। तीन दशकों से जारी यह अभियान आज बैतूल जिले में मानवता, सेवा और सामाजिक समर्पण की मिसाल बना हुआ है।




