रेत से बने एक साधारण पदार्थ ने बदल दी मानव सभ्यता की दिशा ।

कॉर्निंग म्यूज़ियम में सजी मानव सभ्यता और विज्ञान की 3500 साल पुरानी कहानी। अमेरिका का कांच संग्रहालय बना विज्ञान, कला और नवाचार का वैश्विक तीर्थ।

बैतूल। रेत से बना एक साधारण पदार्थ आज दुनिया भर में अरबों लोगों को इंटरनेट से जोड़ रहा है। अमेरिका के कॉर्निंग ग्लास म्यूज़ियम में सहेजी गई 3500 वर्षों की यह अद्भुत यात्रा बताती है कि मानव सभ्यता की सबसे बड़ी क्रांतियों में कांच भी शामिल है।

रेत से बने एक साधारण पदार्थ ने मानव सभ्यता की दिशा बदल दी। खिड़की के शीशे, चश्मे, मोबाइल स्क्रीन और इंटरनेट की रीढ़ बने ऑप्टिकल फाइबर तक, कांच की 3500 वर्षों लंबी यात्रा मानव जिज्ञासा, विज्ञान और नवाचार की अनूठी कहानी बयां करती है। अमेरिका के न्यूयॉर्क राज्य के कॉर्निंग नगर स्थित विश्वविख्यात कॉर्निंग म्यूज़ियम ऑफ़ ग्लास में यह पूरा इतिहास आज भी जीवंत रूप में देखा जा सकता है।

बैतूल निवासी लेखक एवं चिंतक वीरेंद्र कुमार पालीवाल ने अपने वर्तमान अमेरिका प्रवास के दौरान इस संग्रहालय का अवलोकन किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 1951 में स्थापित यह संग्रहालय आज दुनिया का सबसे बड़ा कांच संग्रहालय माना जाता है, जहां 50 हजार से अधिक ऐतिहासिक और आधुनिक कांच कलाकृतियां संरक्षित हैं तथा प्रतिवर्ष तीन लाख से अधिक दर्शक पहुंचते हैं। संग्रहालय में प्राचीन मिस्र से लेकर आधुनिक अंतरिक्ष दूरबीनों तक के काँच उपकरण और कलाकृतियां प्रदर्शित हैं।

– इतिहास के झरोखे में कांच का विकास

मानव इतिहास में कांच निर्माण की शुरुआत लगभग 3500 वर्ष पहले मेसोपोटामिया और प्राचीन मिस्र में हुई थी। उस समय काँच धुंधला और रंगीन हुआ करता था तथा उसका उपयोग आभूषणों और सुगंधित तेल रखने के पात्रों में किया जाता था। रोमन साम्राज्य के दौरान विकसित ग्लास ब्लोइंग तकनीक ने काँच को आम जीवन तक पहुंचाया। बाद में इटली के मुरानो द्वीप के कारीगरों ने पारदर्शी ‘क्रिस्टलो’ काँच तैयार किया, जिसने दूरबीन और सूक्ष्मदर्शी जैसे वैज्ञानिक उपकरणों के विकास का मार्ग प्रशस्त किया।

कांच निर्माण की वैज्ञानिक प्रक्रिया भी उतनी ही रोचक है। सिलिका युक्त रेत, सोडा ऐश और चूना पत्थर को लगभग 1700 डिग्री सेल्सियस तापमान पर पिघलाकर तेजी से ठंडा किया जाता है। इस प्रक्रिया में पदार्थ ठोस तो बन जाता है, लेकिन उसके परमाणु व्यवस्थित क्रिस्टल संरचना नहीं बना पाते, जिससे वह पारदर्शी दिखाई देता है।

– आग, कला और विज्ञान का अनोखा संगम

कॉर्निंग म्यूज़ियम का सबसे आकर्षक केंद्र एम्फीथिएटर हॉट शॉप है, जहां विशेषज्ञ कारीगर 1000 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान पर पिघले काँच को अपनी कला और सांस की फूंक से सुंदर कलाकृतियों में बदलते हैं। यहां आग और कला का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। संग्रहालय आगंतुकों को स्वयं कांच निर्माण का अनुभव लेने का अवसर भी देता है।

संग्रहालय का इनोवेशन सेंटर कांच की वैज्ञानिक उपलब्धियों को प्रदर्शित करता है। थॉमस एडिसन के शुरुआती बिजली बल्ब के कांच आवरण से लेकर आधुनिक टेलीविजन स्क्रीन, प्रयोगशाला उपकरणों और फाइबर ऑप्टिक्स तक की विकास यात्रा यहां विस्तार से दिखाई गई है। वहीं राको रिसर्च लाइब्रेरी काँच के इतिहास, कला और विज्ञान से जुड़ा दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञान केंद्र मानी जाती है।

– गोरिल्ला ग्लास और इंटरनेट की रीढ़

आज स्मार्टफोन, टैबलेट और लैपटॉप की स्क्रीन को सुरक्षित रखने वाला गोरिल्ला ग्लास भी कॉर्निंग की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल है। विशेष रासायनिक प्रक्रिया से तैयार यह कांच झटकों और खरोंचों का बेहतर सामना करता है, जिससे आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अधिक सुरक्षित बन सके हैं।

कांच की सबसे क्रांतिकारी खोज ऑप्टिकल फाइबर को माना जाता है। वर्ष 1970 में कॉर्निंग के वैज्ञानिक डॉ. रॉबर्ट मॉरर, पीटर शुल्ट्ज और डोनाल्ड केक ने व्यावसायिक रूप से उपयोगी लो-लॉस ऑप्टिकल फाइबर विकसित किया। इंसानी बाल से भी पतला यह काँच का तंतु पूर्ण आंतरिक परावर्तन सिद्धांत पर कार्य करते हुए प्रकाश के माध्यम से अरबों गीगाबाइट डेटा हजारों किलोमीटर दूर तक पहुंचाता है। आज वीडियो कॉल, ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल बैंकिंग और ग्रामीण क्षेत्रों तक इंटरनेट पहुंचाने में इसी तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका है।

– बाढ़ से उबरकर बना प्रेरणा का प्रतीक

वर्ष 1972 में उष्णकटिबंधीय तूफान एग्नेस के कारण संग्रहालय में भीषण बाढ़ आई थी, जिससे हजारों ऐतिहासिक वस्तुएं और दुर्लभ पुस्तकें प्रभावित हुईं। इसके बावजूद संग्रहालय प्रबंधन और विशेषज्ञों ने अथक प्रयासों से इस धरोहर को बचाया और बाद में इसे अधिक सुरक्षित स्तर पर पुनर्निर्मित किया गया। यह घटना संस्थान की दृढ़ता और संरक्षण के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

भारत का कांच से रिश्ता भी अत्यंत पुराना है। मोहनजोदड़ो सभ्यता में मिले काँच के मनकों से लेकर राजाओं के शीश महलों और फिरोजाबाद के काँच उद्योग तक इसकी समृद्ध परंपरा दिखाई देती है। आज भारत भी ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क विस्तार में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है।

– मानव प्रतिभा का पारदर्शी दर्पण

वीरेंद्र कुमार पालीवाल के अनुसार कॉर्निंग म्यूज़ियम की यात्रा यह एहसास कराती है कि विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धियां अक्सर साधारण दिखने वाली वस्तुओं में छिपी होती हैं। जिस कांच को हम प्रतिदिन देखते और उपयोग करते हैं, वह 3500 वर्षों की मानव प्रतिभा, जिज्ञासा और वैज्ञानिक नवाचार का जीवंत प्रतीक है। यही कारण है कि कॉर्निंग म्यूज़ियम ऑफ़ ग्लास केवल एक संग्रहालय ही नहीं, मानव सभ्यता की प्रगति का पारदर्शी दर्पण बन चुका है।

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