शिक्षा का समय चक्रव्यूह और बच्चे।

समय के कालचक्र से बच्चों को बचाने की जिम्मेदारी।

लेखक – हर्षा मनोज अग्रवाल

गर्मियों की छुट्टियां चल रही हैं। यह समय बच्चों के लिए आनंद, सीखने और परिवार के साथ जुड़ाव का अवसर होता है, लेकिन आज के मोबाइल और डिजिटल दौर में यही समय कई बार बच्चों को ऐसे चक्रव्यूह में उलझा देता है, जहां से निकलना कठिन हो जाता है। हमारे नन्हे बच्चे, जिनकी किलकारियों से घर गूंजता है, जिनकी भोली-भाली बातें हमारे दिलों को सुकून देती हैं, वही बच्चे किशोरावस्था की दहलीज पर पहुंचते-पहुंचते कभी-कभी व्यवहार में ऐसा परिवर्तन दिखाने लगते हैं कि माता-पिता चिंतित हो उठते हैं।

अक्सर हम इस बदलाव का कारण बाहर ढूंढते हैं, जबकि इसकी जड़ें कहीं न कहीं हमारी दिनचर्या और पारिवारिक वातावरण में छिपी होती हैं। हमने बच्चों को प्रकृति से दूर कर दिया है। उन्हें सुबह की लालिमा से भरे उगते सूरज का सौंदर्य नहीं दिखाया, जो ऊर्जा और सकारात्मकता का संदेश देता है। हमने उन्हें रात की शांति में पूर्णिमा के चांद का सुकून महसूस नहीं कराया, जो मन को स्थिरता देता है।

आज बच्चे स्क्रीन की चमक में उलझ रहे हैं, जबकि उन्हें प्रकृति की रोशनी और परिवार के स्नेह की जरूरत है। व्यक्तित्व विकास में आस्था, अनुशासन और परिवार के प्रति जुड़ाव की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि समय रहते बच्चों में परिवार, संस्कार और जिम्मेदारी का भाव विकसित नहीं किया गया, तो वे आधुनिकता के ऐसे चक्रव्यूह में फंस सकते हैं, जहां जीवन का संतुलन बिगड़ जाता है।

माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों की गतिविधियों पर सतर्क नजर रखें। यह जानना जरूरी है कि उनकी संतान अपना समय किस तरह व्यतीत कर रही है, किन लोगों के संपर्क में है और उसकी सोच किस दिशा में बढ़ रही है। बच्चों के साथ संवाद, उनके साथ समय बिताना और उन्हें जीवन के वास्तविक मूल्यों से परिचित कराना ही सबसे बड़ा उपाय है।

समय रहते यदि हमने अपने बच्चों को सही दिशा दी, तो हमारा जीवन रूपी बाग खुशबूदार फूलों से महकता रहेगा। लेकिन यदि लापरवाही बरती, तो पतझड़ की तरह रिश्तों की हरियाली सूख सकती है। इसलिए जागरूक बनें, बच्चों को समय दें और उन्हें इस कालचक्र के चक्रव्यूह से बचाकर उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जाएं।

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