मध्यस्थता कानून कोर्ट से बाहर विवाद निपटाने का सबसे अच्छा विकल्प।
सुप्रीम कोर्ट ने एकतरफा मध्यस्थ नियुक्ति पर लगाई रोक।

बैतूल। बदलते व्यावसायिक माहौल में विवादों के त्वरित और कम खर्चीले समाधान के रूप में मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 प्रभावी विकल्प बनकर उभरा है। अधिवक्ता भारत सेन ने बताया कि पारंपरिक अदालती प्रक्रिया लंबी, महंगी और सार्वजनिक होती है, जबकि मध्यस्थता में विवाद अदालत के बाहर निष्पक्ष मध्यस्थ द्वारा सुलझाया जाता है और उसका निर्णय कानूनी रूप से बाध्यकारी होता है।
उन्होंने बताया कि मध्यस्थता प्रक्रिया लचीली और गोपनीय होती है, जिसमें पक्षकार अपनी सहमति से मध्यस्थ का चयन कर सकते हैं। इससे समय और खर्च दोनों की बचत होती है और व्यावसायिक गोपनीयता भी बनी रहती है। अधिनियम के तहत दिए गए पुरस्कार को अदालती डिक्री की तरह लागू किया जा सकता है।
अधिनियम की धारा 34 को महत्वपूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि इसके तहत मध्यस्थता पुरस्कार को केवल सीमित आधारों पर ही चुनौती दी जा सकती है, जैसे प्रक्रिया में त्रुटि, निष्पक्षता का अभाव या सार्वजनिक नीति का उल्लंघन। यह अपील नहीं केवल वैधानिक जांच का प्रावधान है और आवेदन 90 दिनों के भीतर करना अनिवार्य होता है।
अधिवक्ता सेन ने कहा कि बैतूल जैसे जिलों में फाइनेंस कंपनियों और व्यावसायिक अनुबंधों में मध्यस्थता क्लॉज आम हो गए हैं, ऐसे में नागरिकों और छोटे व्यापारियों को अनुबंध की शर्तें समझना जरूरी है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि एकतरफा मध्यस्थ की नियुक्ति अमान्य है और निष्पक्षता अनिवार्य है।
उन्होंने आम नागरिकों से अपील की कि किसी भी अनुबंध पर हस्ताक्षर करने से पहले मध्यस्थता शर्तों को ध्यान से पढ़ें और विवाद की स्थिति में समय पर कानूनी सलाह लें, ताकि अपने अधिकारों की रक्षा की जा सके।
(यह लेख सामान्य सूचना के उद्देश्य से तैयार किया गया है। किसी विशिष्ट मामले में योग्य वकील से परामर्श अवश्य लें।)




