मध्यप्रदेश में वन उपज हरण मामलों में बचाव के मजबूत प्रावधान, धारा 52 संशोधन से वाहन राजसात तक चुनौती संभव।

जिला न्यायालय बैतूल के अधिवक्ता भारत सेन का विश्लेषण, प्रक्रिया में त्रुटि और सुनवाई के अधिकार को बताया सबसे बड़ा कानूनी आधार।

बैतूल।

            मध्यप्रदेश में भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 52 में किए गए संशोधनों के बाद वन उपज हरण और अवैध परिवहन के मामलों में जब्ती तथा वाहन राजसात की कार्रवाई को कानूनी रूप से चुनौती देने के कई रास्ते उपलब्ध हैं। मध्यप्रदेश अधिनियम क्रमांक 25/1983 से 1 नवंबर 1983 से लागू व्यापक संशोधन तथा वर्ष 2009 के संशोधन ने इस प्रक्रिया को अधिक कठोर लेकिन न्यायसंगत बनाया है। जिला न्यायालय बैतूल के अधिवक्ता भारत सेन के अनुसार इन प्रावधानों का सही उपयोग कर बचाव पक्ष जब्ती से राहत, वाहन वापसी या राजसात आदेश निरस्त करवाने में सफल हो सकता है।

संशोधित धारा 52 के अनुसार यदि किसी वन अधिकारी या पुलिस अधिकारी को यह विश्वास हो कि वन अपराध हुआ है तो वह वन उपज, औजार, नाव, वाहन, जंजीर या अन्य सामग्री जब्त कर सकता है। लेकिन जब्त सामग्री को तुरंत उप वन मंडल अधिकारी या समकक्ष प्राधिकृत अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करना अनिवार्य है। यदि तत्काल प्रस्तुत करना संभव न हो तो इसकी रिपोर्ट भेजना आवश्यक है। प्राधिकृत अधिकारी साक्ष्य, नोटिस और सुनवाई के बाद ही राजसात का आदेश दे सकता है और यह आदेश तभी वैध माना जाएगा जब पूरी प्रक्रिया का पालन किया गया हो।

– सुनवाई का अधिकार अनिवार्य

संशोधित कानून में सुनवाई का अधिकार अनिवार्य बनाया गया है। आरोपी या संपत्ति के मालिक को नोटिस देना, अपना पक्ष रखने का अवसर देना, सुनवाई करना और निर्णय के कारण लिखित रूप में दर्ज करना आवश्यक है। यदि यह प्रक्रिया पूरी नहीं की जाती तो राजसात आदेश को अपील या पुनरीक्षण में निरस्त किया जा सकता है। कानून में वाहन और औजार के मालिकों के लिए विशेष सुरक्षा भी दी गई है। यदि मालिक यह साबित कर दे कि वाहन या औजार का उपयोग उसके ज्ञान या मिलीभगत के बिना हुआ और उसने उचित सावधानी बरती थी तो राजसात का आदेश नहीं दिया जा सकता।

अधिवक्ता भारत सेन के अनुसार यदि वन उपज का मूल्य एक हजार रुपये से कम है तो केवल उस आधार पर वाहन को राजसात नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों में बचाव पक्ष कानूनी आधार पर वाहन की वापसी की मांग कर सकता है।

वर्ष 2009 के संशोधन में अतिरिक्त सुरक्षा प्रावधान जोड़े गए हैं। इनके अनुसार जब्त संपत्ति अपील या पुनरीक्षण की प्रक्रिया पूरी होने तक कस्टडी में रहेगी। यदि प्राधिकृत अधिकारी स्वयं जब्ती की कार्रवाई में शामिल रहा हो तो मामला उच्च अधिकारी को स्थानांतरित किया जा सकता है।

– बहुस्तरीय अपील की भी व्यवस्था

कानून में बहुस्तरीय अपील व्यवस्था भी दी गई है। धारा 52-ए के तहत प्राधिकृत अधिकारी के आदेश के विरुद्ध कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट के पास अपील की जा सकती है। इसके बाद धारा 52-बी के तहत सत्र न्यायालय में पुनरीक्षण का अधिकार उपलब्ध है। वहीं धारा 52-सी में यह प्रावधान है कि मजिस्ट्रेट की अधिकारिता तभी सीमित होगी जब प्राधिकृत अधिकारी द्वारा इसकी सूचना मजिस्ट्रेट को दी गई हो।

अधिवक्ता भारत सेन का कहना है कि कई वन अपराध धारा 68 के तहत कम्पाउंडेबल भी होते हैं। ऐसे मामलों में आरोपी प्राधिकृत अधिकारी या वन विभाग से कम्पाउंडिंग का आवेदन कर सकता है। हाल के न्यायिक निर्णयों में यह भी कहा गया है कि राजसात की कार्यवाही शुरू करने से पहले कम्पाउंडिंग के विकल्प पर विचार किया जाना चाहिए। इससे पूरा मामला समाप्त हो सकता है।

वन अधिकार अधिनियम 2006 भी ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि आरोपी आदिवासी समुदाय से है और मामला लघु वनोपज के पारंपरिक संग्रहण से जुड़ा है तो वन अधिकार अधिनियम के तहत अधिकारों का दावा प्रस्तुत कर वन अपराध के आरोप को चुनौती दी जा सकती है। धारा 52 का संशोधन वन अधिकार अधिनियम को निरस्त नहीं करता।

– सामग्री की वापसी के साथ निरस्त कराई जा सकती है पूरी कार्रवाई

वन अधिनियम की धारा 69 में यह उपधारणा है कि वन उपज सरकार की मानी जाएगी, लेकिन बचाव पक्ष वैध परमिट, स्थानीय अधिकार या अन्य साक्ष्यों के आधार पर इस उपधारणा को भी खंडित कर सकता है।

अधिवक्ता भारत सेन के अनुसार मध्यप्रदेश में धारा 52 के संशोधन ने राजसात की प्रक्रिया को स्वचालित नहीं रखा बल्कि इसे सुनवाई और न्यायसंगत प्रक्रिया पर आधारित बनाया है। यदि आरोपी समय पर अपील या पुनरीक्षण दायर करे, सुनवाई में अपना पक्ष प्रभावी ढंग से रखे और प्रक्रिया की कमियों को रिकॉर्ड पर लाए तो वाहन और जब्त सामग्री की वापसी के साथ पूरी कार्रवाई भी निरस्त कराई जा सकती है।

उन्होंने कहा कि यह जानकारी अपराध को प्रोत्साहित करने के लिए नहीं बल्कि निर्दोष व्यक्तियों और छोटे उल्लंघन करने वालों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए दी जा रही है। ऐसे मामलों में वन विधि के विशेषज्ञ अधिवक्ता से सलाह लेकर अपील और पुनरीक्षण की कार्यवाही करना आवश्यक है।

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