चन्द्र दर्शन से शुरू हुआ सिडोली पर्व
कुरकू आदिवासी कबिले को रविवार दिखा सिडोली का चान्द

सागौन के मुण्डा में गादी देकर पित्तरों को देवता मानने की अनूठी परंपरा
बैतूल। कुरकू आदिवासी कबीले में रविवार को चन्द्र दर्शन के साथ सिडोली का चान्द दिखाई देने पर पित्तरों की शांति के लिये सिडोली अनुष्ठान की शुरुआत हो गई है। सिडोली कुरकू आदिवासी समाज की एक प्राचीन और पवित्र परंपरा है, जिसमें अपने स्वर्गीय माता-पिता को सागौन के मुण्डा में गादी देकर देवी-देवता के रूप में स्थापित किया जाता है। यह परंपरा आदिकाल से चली आ रही है और आज भी पूरे विधि-विधान, आस्था और सामूहिक सहभागिता के साथ निभाई जाती है।
– प्रकृति पूजक रहे हैं समाज के पुरखे
कोरकू समाज के प्रमुख जानकारी खुशराज ढिकू सिन्ज ने बताया कि कुरकू आदिवासी समाज के पुरखे मूल रूप से प्रकृतिवादी और प्रकृति पूजक रहे हैं। इसी कारण संपूर्ण कुरकू समुदाय प्रकृति धर्म, प्रकृति आधारित रीति-रिवाज और समय-समय पर प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों के अनुसार अपना जीवन यापन करता है। कुरकू आदिवासी पुरखे मानते हैं कि मानव जन्म अपने माता-पिता से होता है, उसी प्रकार ब्रह्माण्ड में ग्रहों के चक्रण से अमावस्या, पूर्णिमा, चन्द्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण जैसी प्राकृतिक घटनाएं घटित होती हैं।
– चान्द का पुनः जन्म की मान्यता
कुरकू आदिवासी समाज में अमावस्या के बाद दिखाई देने वाले चान्द को चान्द का पुनः जन्म माना जाता है। इसी कारण चन्द्र दर्शन का दिन अत्यंत शुभ और पवित्र माना जाता है। समाज में जन्म तिथि का विशेष महत्व है और पुरखे विशेष अवसरों पर अनुमान तिथि दिन पत्रक देखकर निर्णय लेते हैं। हिन्दी पंचांग के अनुसार जहां नये महीने की शुरुआत पूर्णिमा के दूसरे दिन से मानी जाती है, वहीं कुरकू आदिवासी कबीले में चन्द्र दर्शन से महीने की शुरुआत मानी जाती है, जो अमावस्या तक चलती है। कुरकू आदिवासी समाज के सभी महीने 30 दिनों के ही माने जाते हैं।
– यह है खोंटा की परंपरा
कुरकू आदिवासी पुरखों की मान्यता के अनुसार जन्म देने वाले माता-पिता ही संसार के पहले और सबसे बड़े देवी-देवता होते हैं। इसी विश्वास के चलते पित्तरों का हर बिदरी और तीज पर खोंटा या पूजा करने की परंपरा प्रचलित है। चान्द दिखने के बाद उस महीने में आने वाले बिदरी या तीज को मनाने के लिए गांव के सियाने और गणमान्य लोग चावड़ी करते हैं, तिथि निर्धारित की जाती है और फिर बिदरी और तीज सामूहिक व सार्वजनिक रूप से गडली-सुसुन के साथ मनाई जाती है। इस दौरान प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों के अनुरूप कुरकू बोली में लोकगीत गाए जाते हैं और ढोल व बांसुरी की मधुर ध्वनि पर पूरा गांव एक साथ थिरकते हुए एकता और संगठन के साथ पर्व मनाता है।
– यह है सिडोली खोंटा की परम्परा
कुरकू आदिवासी समाज की रूढ़ीप्रथा और रीति-रिवाज के अनुसार पूष का महीना अत्यंत पावन और पवित्र माना जाता है। जिन माता-पिता ने जन्म देकर लालन-पालन, भरण-पोषण कर संतान को योग्य बनाया, उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का यह महीना आध्यात्मिक, धार्मिक और पर्यावरणीय दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। माता-पिता के स्वर्गवास होने पर तीसरे या सातवें दिन मिमलाव खोंटा किया जाता है। इसके बाद पूष महीने में सिडोली खोंटा कर सागौन के मुण्डे में गादी देकर माता-पिता को देवी-देवता के रूप में स्थापित किया जाता है।
– आज से शुरू होंगे कार्यक्रम
आज सोमवार से सिडोली के पारंपरिक ढोल और बांसुरी की सुमधुर ध्वनि के साथ विभिन्न नेग संपन्न होंगे। इनमें सागौन और सेमल के पेड़ को निवता रखना, गाडा उजाल, हाडे डेडेज और फूल जागनेर शामिल हैं। रात में उरा उजाल किया जाएगा। मंगलवार को सागौन और सेमल के पेड़ काटकर लाए जाएंगे और मुण्डा तैयार होने पर खड़क्या में सेमल और बकरा कांटा जाएगा। बुधवार को बोना तैयार किया जाएगा और बोना या खाना खिलाकर मुण्डा स्थापना के लिए अंतिम घापता जुवार किया जाएगा। इसके बाद कुटुम्ब की गाथा-मुण्डा, पीढ़ी या भीढ़ी मढ़ई में मुण्डा स्थापना की जाएगी।
– प्रकृति का खोंटा करने की परंपरा
कुरकू आदिवासी समाज में प्रकृति को सबका कल्याण और भरण-पोषण करने वाली शक्ति माना जाता है, इसलिए प्रकृति का खोंटा करने की परंपरा है। जन्म, लगुन से लेकर मरण तक खोंटा और पूजन प्रकृति रिवाज के अनुसार किया जाता है। अनाज की दावन के समय खलिहान में बैलों की आरती करना, मण्ढा सूतना या पानी सारना, घट्टी से अनाज पीसना जैसे सभी कार्य स्यव के जेवने फेरे के साथ ही सम्पन्न करने की परंपरा आज भी जीवित है। यही परंपराएं कुरकू आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान और प्रकृति से जुड़ी गहरी आस्था को दर्शाती हैं।




