कर्मठता प्रतिबद्धता जैसे शब्द ही जिसके जीवन के आभूषण रहे _बैतूल का अटल बिहारी _एक कर्मठ प्रतिबद्ध कार्यकर्ता सुभाष चंद्र आहूजा

(हेमंत चंद्र दुबे बबलू) ✍️

इंसान की कर्मठता प्रतिबद्धता जैसे शब्द जिसके जीवन के आभूषण रहे और वहीं शब्द उसके जीवन के लिए अभिशाप बन गए।वह पूरे जीवन कर्मठता के तमगे के साथ जीते रहा जिस प्रकार भीष्म पिता मह हस्तिनापुर सिंहासन से प्रतिबद्ध कर्मठता जीवन भर बंधे रहे। आंखों के सामने अन्याय होते रहा लेकिन सिंहासन के प्रति अपनी कर्मठता प्रतिबद्धता से नहीं डिगे। संगठनों में , संस्थाओं में भी ऐसे ही अनेकों कार्यकर्ता होते है जो कर्मठता के साथ विचारधारा से बंधे जीवन गुजार देते हैं , बस जीवन मे इस संतोष के साथ की हमारी प्रतिबद्धता को कभी कोई

डिगा नहीं सका ,अपना पूरा जीवन सर्वस्व अपने संगठन को न्योछावर कर देते है । लंका विजय के बाद अयोध्या में जब राम दरबार सजता है तब हर छोटे बड़े को पुरस्कार मिल जाता हैं लेकिन हनुमान जी महराज को कोई उपहार नहीं मिलता यह देख सीता मां दुःखी हो जाती हैं , यदि रामजी को बोले तो शिकायत हो जायेगी, तो स्वयं सीता मां अपने गले की माला हनुमान जी महाराज को दे देती हैं ,हनुमान जी महराज वह मोतियों की माला तोड़ तोड़ कर फेकने लगते मां सीता को यह दृश्य देख बहुत बुरा लगता है वे कहती है हे वानर ये क्या कर रहे हो ,? अब समझ आया कि रामजी कोई उपहार क्यों नहीं दे रहे थे? तुम उपहार की । कीमत नहीं समझते ।हनुमान जी बोले मां मुझे इन मोतियों में रामजी कि छवि नहीं दिखती इसलिए मैं तोड़ तोड़ कर रामजी की छवि मोतियों में देखने का प्रयास कर रहा था, जो छवि मेरे सीने में है और हनुमान सीना चीरकर रामजी की छवि के दर्शन मां सीता को करा देते है, युगों युगों से कर्मठता प्रतिबद्धता, पवित्रता जैसे शब्द हमेशा कर्मठ इंसान की परीक्षा ही लेते रहा है, फिर चाहे वह सीता मां स्वयं ही क्यों न रही हों?

ऐसे ही इंसानों व्यक्तित्वों से दुनिया भरी पड़ी है, जिनके जीवन मे ये शब्द उसे जीवन भर उससे उसकी कर्मठता प्रतिबद्धता पवित्रता की परीक्षा ही दिलवाते

रहते है, बदले में उसे केवल कर्मठता प्रतिबद्धता का तमगा ही हासिल होता हैं जिसके सहारे वह अपने जीवन के संघर्ष को जी लेता है। अवसर उसके जीवन में भी आते है , लेकिन कर्मठता प्रतिबद्धता जैसे शब्दों के बोझिल भार से वह दबा सब बातों को हंसते हंसते स्वीकार करते चला जाता हैं वह हर स्थिति में खुश रहता है _लंबे संघर्ष के बाद उसका वह सपना अंधेरा छटेगा , कमल खिलेगा पूर्ण हो जाता हैं _वह इसी में आत्म विभोर हो उठता हैं _धारा 370 हट जाती हैं तो उसको लगता है कि मेरे देश का मुकुट चमचमा उठा है _राम मंदिर का निर्माण हो जाता हैं तो उसे लगता है कि भारत का स्वाभिमान पुनर्स्थापित हो गया है, वही बुलंद आवाज में बिना किसी पद के अपनी विचारधारा को जन जन के बीच रखते चले चलता है, न जाने उससे कितने ही छोटे छोटे को क्या क्या नहीं दे दिया जाता है, पर कभी अपने बड़ों से कोई शिकायत नहीं, बल्कि पद पर विराजित लोगों के लिए भरपूर शुभकामना से आसमान गूंजा देता _जब भी संबोधन मिला भूतपूर्व सांसद ,लेकिन कभी अपने वर्तमान से कोई शिकायत नहीं रही_अपने अतीत पर हल्की सी चेहरे पर मुस्कुराहट_भविष्य की कभी कोई चिंता नहीं रही_वह शख्स और कोई नहीं बैतूल का लाल , बैतूल का अटल बिहारी वाजपेई _राजनीति का संत_लोकतंत्र सेनानी सुभाष चंद्र आहूजा _जिसने जीवन के अभी 26 बसंत भी नहीं देखे थे 19 माहों तक जेल में डाल दिए गए, छात्र जीवन में मेधावी छात्र में गिने जाने वाले अपने गुरुजनों के प्रिय शिष्य सुभाष।

1977 में टिकिट दी नहीं गई थीं क्योंकि कोई लड़ने को तैयार नहीं था, इसलिए युवाओं के हीरो सुभाष चंद्र आहूजा के गले में टिकिट बांध दी गई थी , गरीबी गुरबत में लड़ा गया वह चुनाव लोकतांत्रिक मूल्यों की विजय थी, दिल्ली संसद पहुंचे , किन्तु अल्प समय में ही हजारों देशवासियों का सपना बिखर गया जनता पार्टी बिखर गई 1980 का चुनाव फिर पराजित,1984 का चुनाव फिर पराजित लेकिन हौसले कभी पराजित नहीं हुए कमल की जीत के लिए उसी उत्साह से , ऊर्जा से जैसे स्वयं चुनाव में खड़े हुए हो।

बस यही एक पद 48 बरस की संगठन साधना में कोई पदवी मिल सकी तो वह भूतपूर्व सांसद। किसी से कोई शिकायत नहीं ,कोई गिला शिकवा नहीं, यहां तक कि संगठन के जिलाध्यक्ष के चुनावों में भी पराजित करवा दिए गए हंसते हंसते अपनी काइनेटिक होंडा से परिणाम में पराजित हो लेकिन जीवन में चेहरे पर विजय मुस्कान के साथ पुनः संगठन के आदेशों , निर्देशों की राह पर चल पड़े इसी आशा के साथ की संगठन फिर किसी विजय की विजय की बागडोर हाथ में देगा और मैं उस अग्नि परीक्षा में खरा उतरूंगा।

ऐसे कालजायी कार्यकर्ता को भी निर्विरोध चुनने में संगठन को दिक्कतें महसूस हो गई ,लेकिन वह अपने कर्तव्य पथ से नहीं डिगा , संगठन विचार के लिए कार्य जारी रखते चला गया _ चरैवेति ,_ चरैवेति _अटल जी की वह बुलंद आवाज जो सुभाष भाई के रूप में हमारे बीच थी मेरे प्यारे भाइयों बहनों _, अंधेरा छटेगा , कमल खिलेगा सदैव सदैव गूंजती रहेगी। एक विन्रम श्रद्धांजली।

  • (हेमंत चंद्र दुबे बबलू) ✍️

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