काम की बात।
प्रणाम के मायने।

विजय के वर्मा
प्रिय मित्रों,
कल आदरणीय मोदी जी को पश्चिम बंगाल में मंच से जनता जनार्दन से मिले जनादेश को प्रणाम करते हुए देखकर हमें अपने लेख “परिणाम को प्रणाम”, जो दैनिक ताप्ती दर्शन में 22 मार्च 2022 को प्रकाशित हुआ था, उसकी याद आ गई। यह एक अच्छी सोच है, जो राजनीति को रामनीति की ओर एक कदम और आगे ले जाएगी। आने वाले कल के इस युग में यह सोच हर देशभक्त और भारत माता से प्यार करने वाले भारतीय की भावना को मजबूती प्रदान करेगी।
प्रधानमंत्री जी के “पंच प्राण” – विकसित भारत का विराट संकल्प, गुलामी की मानसिकता से मुक्ति, अपनी विरासत पर गर्व, एकजुटता को अक्षुण्ण रखना और कर्तव्य निर्वहन को प्राथमिकता देना – तभी पूर्ण होंगे, जब हमारा भारत समृद्ध होगा और अंतिम छोर पर रहने वाला देशवासी भी सुखी एवं संपन्न होगा, जो आज भी रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए संघर्ष कर रहा है।
प्रधानमंत्री जी का यह प्रणाम सर्वप्रथम देश के उन करोड़ों भारतीय जनता पार्टी के सदस्यों के लिए एक संदेश है, जिसका पालन करने से आने वाले सुनहरे भविष्य में भारतीय जनता पार्टी और अधिक मजबूत होगी। शायद यही मायने हैं मोदी जी के इस प्रणाम के, जिसे देश के सभी दलों के जिम्मेदार और समझदार नेताओं को समझना चाहिए।
इससे भी एक कदम आगे जाकर जनता जनार्दन की सेवा के लिए और क्या अच्छा किया जा सकता है, इस पर विचार होना चाहिए। तभी सत्ता रूपी मेवा का सुख प्राप्त होगा। वरना “आज नहीं तो कल हमें भी सत्ता मिलेगी” जैसी सोच के साथ केवल समय बिताने से आने वाले चुनावों में शायद ही कोई लाभ मिले। क्योंकि आज राजनीति के वे डायलॉग — “हम ऐसा करेंगे, वैसा करेंगे” — अब बदलकर “हमने ऐसा किया है” में परिवर्तित हो चुके हैं। यही आज की राजनीतिक सच्चाई है, जिसे सभी को स्वीकार करना होगा।
मित्रों, आज दुनिया बम-बारूद के धुएँ से परेशान है। इस तेल के खेल में कब कौन सरफिरा लाल बटन दबाकर तीसरे विश्व युद्ध की शुरुआत कर दे, यह प्रश्न अभी भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है। इसका हल निकालना दुनिया के हर जिम्मेदार एवं समझदार नेता की जिम्मेदारी है। इसमें भारत की भूमिका तय करना केवल सरकार का ही नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति का दायित्व है जो प्रकृति प्रेमी है। इस विषय पर बिना किसी लाग-लपेट के सभी को एकमत होकर काम करना चाहिए, चाहे वे किसी भी पार्टी से जुड़े हों।
मित्रों, यह एक सच्चाई है कि समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। समय की धारा में सभी को बहना पड़ता है, फिर वह भक्त हो या भगवान। लेकिन जो लोग समय की धारा को मोड़कर अपनी मेहनत और किस्मत से आदमी से इंसान, और इंसान से महान बनने में सफल होते हैं, वही हमेशा आदर और सम्मान के साथ याद किए जाते हैं।
इसलिए जो भोले-भाले हैं, वही तो नाथ के कृपा पात्र हैं। ऐसे लोगों का उपहास करने से हमें हमेशा बचना चाहिए। यह भी एक काम की बात है, जिसे ध्यान में रखते हुए हर कार्य होना चाहिए। इससे हमारे आसपास एक अच्छा वातावरण बनेगा।
क्योंकि यह कहना कि “अब कुछ नहीं हो सकता”, एक ऐसी सोच है जो तालाब के ठहरे हुए गंदे पानी की तरह हमारी जिंदगी को केवल बदबू से भर देगी। धीरे-धीरे हम अकेले पड़ जाएंगे। इसलिए यह कोई काम की बात नहीं है।
कायदे की बात तो यही है कि — “जो है, जैसा है, सब ठीक है ना यार, प्रभु कृपा से।”
समय की धारा में स्वस्थ मन के साथ स्नान करते रहिए। अपने आसपास के लोगों के साथ संगीत की धारा में भी फुर्सत के क्षण बिताइए, जिससे मानसिक तनाव कम होगा। “टेंशन” को पालना मतलब “दस सूर्यों” की गर्मी से अपने दिमाग को गर्म करना है। अभी इस गर्मी के मौसम में एक सूर्यनारायण से ही हालत खराब है, तो फिर ऐसी सोच क्यों रखें जो दिमाग में तनाव पैदा करे? क्योंकि इससे कोई फायदे की बात नहीं होगी।
इसलिए आपकी सोच में सुंदरता होना चाहिए। मुस्कुराइए उन फूलों की तरह, जो दिनभर धूप में तपने के बाद भी शाम को अपनी खुशबू और सुंदरता से हमारे दिलों को मुस्कुराने का निमंत्रण देते हैं।
शेष फिर…
— विजय के वर्मा




