मर्यादा और शक्ति का मिलन ही रामनवमी की सच्ची सार्थकता।

चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व संपूर्ण प्रकृति और साधक के अंतस में शक्ति के तीव्र संचार का समय है। यह कोई सामान्य संयोग नहीं है कि शक्ति साधना के इन नौ दिनों का समापन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के जन्मोत्सव के साथ होता है। अध्यात्म का यह बहुत गहरा संकेत है कि जहां शक्ति की पूर्णता होती है, वहीं धर्म का अवतरण संभव है। जब तक साधक के भीतर शक्ति जागृत नहीं होती, तब तक उसके जीवन में संतुलन और मर्यादा की स्थापना नहीं हो सकती। इसीलिए नवरात्रि की साधना केवल देवी की आराधना नहीं, बल्कि उस चेतना को प्रज्वलित करने की प्रक्रिया है, जो अंततः राम के रूप में हमारे भीतर प्रकट होती है।
– सीतारामः एक गहरा तंत्र रहस्य
हम अक्सर ‘जय सियाराम’ या ‘सीताराम’ का जयकारा लगाते हैं और इसे केवल भक्ति भाव का प्रतीक मानते हैं। परंतु इस सरल प्रतीत होने वाले शब्द में एक महान आध्यात्मिक और तांत्रिक रहस्य छुपा हुआ है। ‘सीतारामः’ शब्द का वास्तविक अर्थ भगवान राम और माता सीता के संयोग से कहीं अधिक गहरा है। यदि हम इसे ध्यान से देखें तो इसमें ‘तारा’ की शक्ति निहित है। तंत्र शास्त्र की दस महाविद्याओं में भगवती तारा का द्वितीय स्थान है। उन्हें ‘तारिणी’ कहा गया है, जिसका अर्थ है वह शक्ति, जो डूबते हुए जीव को संभालती है और उसे भवसागर से पार ले जाती है।
यही कारण है कि भगवान श्री राम को ‘तारणहार’ कहा गया है। सीताराम का निरंतर स्मरण वास्तव में उस दिव्य ऊर्जा का आह्वान है, जो हमें संसार के दुःखों, क्लेशों और मोह-माया की लहरों से बाहर निकालने में सक्षम है। तंत्र शास्त्रों के अनुसार दस महाविद्याएं ही ब्राह्मांड की मूल शक्तियां है और इन शक्तियों का सीधा संबंध हमारे आराध्य देवों से है। जिस प्रकार महाकाली का संबंध भगवान श्री कृष्ण से है, उसी प्रकार तारा महाविद्या का सीधा संबंध भगवान श्री राम से माना गया है। कुछ साधना परंपराओं में तो श्री राम को ‘तारा पुत्र’ या उनकी शक्ति का साकार अवतार भी कहा जाता है।
– राम की विजय और तारा शक्ति का सामंजस्य
गुरुदेव उल्लेख करते हैं कि रावण कोई साधारण शत्रु नहीं था, वह एक प्रकांड विद्वान और महान तपस्वी था, जिसके पास अपार शक्तियां थीं। ऐसे प्रचंड शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी पर विजय प्राप्त करने के लिए केवल भौतिक अस्त्र-शस्त्र पर्याप्त नहीं थे। भगवान राम ने जिस आंतरिक दिव्य शक्ति और अमोघ विवेक का आश्रय लिया था, वह भगवती तारा की ही शक्ति थी। तारा देवी संकट के समय मार्ग दिखाने वाली ‘पथप्रदर्शिका’ हैं। जब मनुष्य का जीवन मोह और अज्ञान के अंधकार में घिरा हो, तब तारा की शक्ति ही उसे विवेक का प्रकाश प्रदान करती है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कलिकाल में नाम स्मरण की महिमा बताते हुए कहा है कि इस युग में कठिन योग, यज्ञ या तप हर किसी के लिए संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में केवल ‘सीताराम’ नाम का गुणगान ही जीव को भवसागर से पार ले जाने का सबसे सुगम सेतु है। यहां ‘उस पार’ जाने का अर्थ जीवन की समाप्ति नहीं, संताप से मुक्ति और परम विश्राम की प्राप्ति है।
– जीवन के हलाहल को कंठ में रोकना सीखें
समुद्र मंथन का प्रसंग हमारे जीवन के लिए एक बड़ा मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक पाठ है। गुरुदेव बताते हैं कि जब मंथन से कालकूट विष निकला तो भगवान शिव ने उसे ग्रहण किया। उस समय देवी तारा ने तुरंत शिव के कंठ को पकड़ लिया, ताकि विष उनके पूरे शरीर में न फैले। इससे शिव ‘नीलकंठ’ कहलाए और सृष्टि की रक्षा हुई। यह घटना हमें सिखाती है कि हमारे जीवन में भी क्रोध, मोह, ईर्ष्या और पीड़ा के रूप में निरंतर ‘विष’ उत्पन्न होता रहता है।
एक कुशल साधक वही है, जो तारा की शक्ति का उपयोग कर इस विष को अपने अस्तित्व और व्यवहार में फैलने से रोक ले। यदि हम अपने भीतर उठने वाले क्लेश को वाणी या व्यवहार के माध्यम से बाहर फैला देते हैं, तो वह हमारे संबंधों और शांति का विनाश कर देता है। भगवान राम के चरित्र में यही अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। वे हर परिस्थिति में, चाहे वह राज्याभिषेक का उल्लास हो या वनवास का दुख,सदैव ‘स्थितप्रज्ञ’ बने रहते हैं, क्योंकि उनके भीतर तारा की शक्ति निरंतर क्रियाशील रहती है, जो उनकी बुद्धि को भ्रम से मुक्त रखती है।
– सुमति से ही संभव है लक्ष्मी का स्थायित्व
अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि ये बहुत परिश्रम करते हैं, धन कमाते हैं, परंतु वह टिकता नहीं है। गुरुदेव इसका समाधान बताते हुए कहते हैं कि भगवती तारा में लक्ष्मी और सरस्वती दोनों शक्तियों का अद्भुत समन्वय है। विश्वामित्र जी ने भी बुद्धि की शुद्धि के लिए गायत्री और ऐश्वर्य के लिए तारा की साधना की थी। सत्य तो यह है कि धन का स्थायित्व केवल मेहनत से नहीं, ‘शुद्ध बुद्धि’ से आता है। जब मनुष्य अज्ञान या लोभ के वश गलत निर्णय लेता है, तो प्राप्त लक्ष्मी भी उससे दूर हो जाती है। तारा की साधना मनुष्य को क्रिया और बुद्धि के तत्व से जोड़ती है, जिससे उसका कर्म शुद्ध हो जाता है और जीवन संतुलित हो जाता है। इस रामनवमी पर हमारा उद्देश्य केवल उत्सव मनाना नहीं, बल्कि अपने भीतर उस ‘तारा’ शक्ति को खोजना होना चाहिए, जो हमें इस पार के अंधकार और असंतोष से निकालकर उस पार के प्रकाश और आनंद तक पहुंचा सके। मर्यादा और शक्ति का यह मिलन ही वास्तव में रामनवमी को सच्ची सार्थकता है।
(साभार: निखिल मंत्र विज्ञान)




