हॉकी के 100 साल की गौरवगाथा, जहां पसीने से लिखा गया था स्वर्णिम इतिहास, बैतूल के मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में खिलाड़ियों ने मनाया भारतीय हॉकी का शताब्दी वर्ष

तीन दिवसीय जिला स्तरीय हॉकी प्रतियोगिताओं का समापन

बैतूल। जब बात होती है भारतीय हॉकी की, तो दिल अपने आप मेजर ध्यानचंद की यादों में चला जाता है। वही जादूगर, जिसकी स्टिक के आगे दुनिया झुकी थी, वही खेल जिसने भारत को ओलंपिक स्वर्ण दिलाया था। इसी ऐतिहासिक सफर के 100 वर्ष पूरे होने पर बैतूल के मेजर ध्यानचंद हॉकी स्टेडियम में शुक्रवार सुबह हॉकी बैतूल द्वारा भव्य रूप से हॉकी शताब्दी वर्ष मनाया गया। तीन दिवसीय जिला स्तरीय हॉकी प्रतियोगिताओं का समापन इसी अवसर पर हुआ।

इस अवसर पर हॉकी बैतूल द्वारा नवोदित खिलाड़ियों को किट वितरित की गई और विजेता तथा उपविजेता टीमों को पुरस्कार प्रदान किए गए। पुरुष वर्ग में टीम स्व. शुभम यादव को उपविजेता घोषित किया गया, वहीं टीम स्व. बलबीर सिंह अलुवालिया ने विजेता बनकर बैतूल का नाम रोशन किया। खिलाड़ियों की मेहनत और संघर्ष को देखकर दर्शकों ने तालियों से उनका स्वागत किया।

– आज का दिन भारतीय हॉकी के इतिहास में मील का पत्थर 

जिला हॉकी संघ के सचिव जगेंद्र सिंह तोमर ने बताया कि आज का दिन भारतीय हॉकी के इतिहास में मील का पत्थर है। 7 नवंबर 1925 को भारतीय हॉकी की स्थापना हुई थी और मात्र तीन वर्ष बाद 1928 के एम्सटर्डम ओलंपिक में भारत ने पहला स्वर्ण पदक जीतकर विश्व को दिखा दिया था कि यह देश सिर्फ खेलता नहीं, खेल को साधना की तरह जीता है।

इसके बाद भारतीय हॉकी ने इतिहास रचा लगातार ओलंपिक स्वर्ण, विश्व विजेता का खिताब और फिर 2020 व 2024 में मिले कांस्य पदक, जो इस खेल की नई चमक हैं। तोमर ने कहा कि हॉकी खेल भारत की पहचान है, यह हर भारतीय खिलाड़ी के दिल की धड़कन है।

– हॉकी को फिर से स्वर्णिम ऊंचाइयों तक पहुंचाने का संकल्प

इस अवसर पर हॉकी संघ के अध्यक्ष अक्षय वर्मा, देवेन्द्र पाटिल, अजाबराव झरबडे, शैलेश गुबरेले, सुधीर जैन, पद्मकांत शुक्ला, राजमणि एंथनी, बाबूराव दौड़के, हॉकी संघ के पदाधिकारी तथा खेल एवं युवा कल्याण विभाग के कर्मचारी विशेष रूप से उपस्थित रहे। सभी ने मिलकर हॉकी के गौरवशाली 100 वर्षों को नमन किया और भविष्य में भारतीय हॉकी को फिर से स्वर्णिम ऊंचाइयों तक पहुंचाने का संकल्प लिया।

बैतूल में यह आयोजन एक ऐसी भावना थी, उस जुनून की, जिसने भारत को हॉकी में विश्व गुरु बनाया। मैदान में खेला गया मैच भारतीय खेल इतिहास के सौ साल पूरे होने की एक झलक थी, जो हर खिलाड़ी की आंखों में चमक बनकर झलक रही थी।

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