मातृत्व की जिम्मेदारी समझे समाज। बच्चों के संस्कार से तय होगा समाज का भविष्य।
पश्चिमी प्रभाव के बीच भारतीय नारी की भूमिका पर मंथन जरूरी । मां की समझ से बनती है आने वाली पीढ़ी की सही दिशा।

संपादकीय
महिला और अंतरराष्ट्रीय शब्द भारत की महिलाओं के लिए सोचने का विषय भी हैं और आत्ममंथन का अवसर भी। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर समाज और देश-विदेश में महिलाओं को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है, लेकिन यह भावना अक्सर कुछ क्षण, कुछ समय या कुछ दिनों तक ही सीमित रह जाती है। इसके बाद महिला सम्मान का विषय धीरे-धीरे स्मृति से धूमिल होता चला जाता है। कुछ वर्ष पहले तक यह भावना थोड़े लंबे समय तक बनी रहती थी, लेकिन अब परिस्थितियां तेजी से बदल गई हैं।
इस बदलाव के पीछे पाश्चात्य देशों की अधूरी संस्कृति और अधूरे पाठ्यक्रम का प्रभाव भी माना जा रहा है, जिसने भारतीय नारी समाज को ऐसे रास्ते पर खड़ा कर दिया है, जहां वह स्वयं भी पूरी तरह समझ नहीं पा रही कि परिवर्तन किस दिशा में हो रहा है। भारतीय संस्कृति में नारी को कोमलता, संवेदना और सृजन का प्रतीक माना गया है, लेकिन आधुनिक समय में कई धारणाओं ने इस मूल स्वरूप को बदलने का प्रयास किया है।
एक प्रसिद्ध गीत की पंक्ति ‘कोमल है कमजोर नहीं तू, शक्ति का नाम ही नारी है’ ने महिलाओं को आत्मबल देने का संदेश तो दिया, लेकिन इसके प्रभाव में कई बार समाज में एक अलग तरह का दृष्टिकोण भी विकसित हुआ। आज समाज के विभिन्न वर्गों में महिलाएं बदलती जीवनशैली और पश्चिमी प्रभाव के कारण नए रूप में दिखाई दे रही हैं। कई महिलाएं परिस्थितियों के कारण मौन हैं, कुछ इसे समय का चलन मानकर स्वीकार कर रही हैं और कुछ इस बदलते वातावरण में ऐसे व्यसनों की ओर भी बढ़ गई हैं, जो उनके जीवन को नुकसान पहुंचा रहे हैं। इस स्थिति में यह सवाल भी उठता है कि क्या कहीं न कहीं महिला स्वयं भी अपनी स्थिति के लिए जिम्मेदार बन रही है।
नारी की वास्तविक शक्ति उसके सृजन और संस्कार में निहित है। वह यदि अपनी शक्ति को पहचान ले तो घर से लेकर पूरे भारतीय समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। बाल मनोविज्ञान भी यही बताता है कि बच्चे के जीवन की प्रारंभिक अवस्था ही उसके भविष्य की नींव तैयार करती है। आज जब अधिकांश महिलाएं शिक्षित हैं तो उनके सामने यह जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे सही और गलत का अंतर समझें और आने वाली पीढ़ी को सही दिशा दें।
बच्चों के जन्म के साथ ही माता-पिता की जिम्मेदारी शुरू हो जाती है। जीवन की राह कभी रुकती नहीं और हर समय नई दिशाएं सामने आती रहती हैं। ऐसे में बच्चों के जीवन की डोर सबसे पहले मां के हाथ में होती है। यदि मां स्वयं सही राह को नहीं समझती तो बच्चों को सही दिशा देना भी कठिन हो जाता है।
विज्ञान भी इस तथ्य को स्वीकार करता है कि पांच वर्ष की आयु तक बच्चे का मानसिक विकास तेजी से होता है। इसी उम्र में वह जिज्ञासु, कल्पनाशील और सक्रिय बनता है। वह अपनी भावनाएं व्यक्त करना सीखता है, मित्रों के साथ खेलता है और धीरे-धीरे सही-गलत का अंतर समझते हुए सामाजिक नियमों का पालन करना भी सीखने लगता है। यदि माता-पिता इस अवस्था को गंभीरता से समझें तो इस कोमल फूल को सही मार्गदर्शन देकर समाज के लिए एक संवेदनशील और सम्मानजनक भविष्य तैयार किया जा सकता है।
महिला दिवस के अवसर पर यह संदेश भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि यदि बच्चों को जन्म दिया है तो स्वयं को जिम्मेदार माता-पिता के रूप में स्वीकार करना होगा। विशेष रूप से महिलाओं को अपने सृजनात्मक गुणों को पहचानते हुए पोषण, संवेदना और जीवंत शक्ति के माध्यम से नई पीढ़ी का निर्माण करना होगा। यही वह मार्ग है, जिससे समाज में सभी वर्गों की महिलाओं के सम्मान की भावना मजबूत होगी और मानव होने का वास्तविक गौरव भी प्राप्त होगा।
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*नोट*- यह विचार *लेखिका श्रीमती हर्षा मनोज अग्रवाल* द्वारा महिला दिवस के अवसर पर समाज के प्रति एक आग्रह के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें नारी की शक्ति, उसकी जिम्मेदारी और आने वाली पीढ़ी के निर्माण में उसकी भूमिका पर गंभीर चिंतन करने की आवश्यकता बताई गई है।




