सरदार क्रांतिकारी विष्णु सिंह जी के हिस्से इस देश में आया बस स्टैंड का नाम

हेमंत चंद्र दुबे बबलू बैतूल

सरदार क्रांतिकारी सरदार विष्णु सिंह जी के हिस्से आया बस स्टैंड और उन्हें फ़ांसी के फंदे से नीचे उतारकर लाने वाले पंडित आंबेकर शास्त्री जी के हिस्से चौक का नामकरण के ज्ञापन और जन प्रतिनिधियो के झूठे आश्वासन

भाग 12

सरदार क्रांतिकारी विष्णु सिंह जी के हिस्से इस देश में आया बस स्टैंड का नाम।

जिन्होंने भारत मां की आजादी , अपने जंगल बचाने के लिए अपने साथियों के साथ जंगल सत्याग्रह कर अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र क्रांति का नेतृत्व कर अंग्रेजी हुकूमत की ईंट से ईंट बजा दी नींव हिला दी , उन महान क्रांतिकारी के सम्मान के हिस्से आया में बैतूल का बस स्टैंड , जिस पर आप उतरिए, चढ़िए, आइए जाइये , गंदगी फेंकिए,जहां बस एजेंट चिल्ला चिल्ला कर बस के लिए यही सुने जा सकते है_कालीमाई, पाथाखेड़ा _सारणी फिर दूसरी ओर से उससे ज्यादा तेज आवाज में चिल्लाते दूसरा एजेंट सुनाई देता है पाढर _शाहपुर _भौरा आज तक वहां कोई सरदार विष्णु सिंह जी की क्रांति की शौर्य गाथा को याद करते हुए कोई नहीं पूछ रहा है कि सरदार विष्णु सिंह जी के देश के जंगल बचाने की क्रांति का पद्म सम्मान किधर है? जरा जाकर इस देश को आजाद कराने वाले के नाम पर बस स्टैंड पर पसरी गंदगी को देखकर आइये। रूह कांप जायेगी।क्या इसी गंदगी को देखने के लिए ही उन्होंने अपने प्राणों को न्योछावर करने के लिए अपना जीवन भारत मां के चरणों में अर्पण कर दिया था? वाह मेरे नागरिक , वाह मेरी नगर सरकार। मांग उठी नहीं कि क्रान्तिकारियों के नाम से रेलवे स्टेशन, उद्यान, बस स्टैंड के नाम रखने में हमारी सरकारें समय नहीं लगाती क्योंकि वे जानती है कि रेलवे स्टेशन, उद्यान, बस स्टैंड पर होना क्या है? कौन वहाँ सरदार विष्णु सिंह जी की पुण्य गाथा का गान होना है, वहां तो वही होना है जो बस स्टैंड कि तासीर और स्वभाव है! सम्मान अपने और अपने वालो के नाम सुरक्षित कर लिये और बस स्टैंड , रेलवे स्टेशन के नाम क्रांतिकारियों के नाम से रख दिए।

इस देश में सरदार विष्णु सिंह जी के त्याग, समर्पण ,तपस्या,, जंगल को बचाने वाले को बस स्टैंड में गंदगी के साथ सिमटा कर रख दिया और जंगल में हरियाली पैदा करने वाले राष्ट्रपति भवन में सम्मान लेने के हकदार हो गए। आखिर यह सम्मान के कैसे मानदंड है जो जंगल बचाने के लिये 29 वर्षों तक अंग्रेजों के जुल्म सितम सहे वह गंदगी से भरे बस स्टैंड के हकदार है, और जो पदों पर बैठ दस्तावेजों का प्रबंधन करे वह राष्ट्रपति महल में सम्मान के हकदार है, यह कौन सा सम्मान है और न्याय है? मेरे नागरिक ने भी कभी सरकारों से, जन प्रतिनिधियो से , कलेक्टर साहब से नहीं पूछा कि आखिर सब पद्म सम्मान के हकदार हो जाते हैं मेरे हमारे सरदार विष्णु सिंह जी इसके हकदार क्यों नहीं होते है? आखिर उनका क्या अपराध है ? यही की वे अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज बुलंद कर सशस्त्र क्रांति करने वाले क्रांतिकारी थे? यह की उन्होंने अपने जंगलों को बचाने के लिए जंगल सत्याग्रह आंदोलन को खड़ा किया था? इसलिए कि वे आदिवासी वनवासी बंधुओं का नेतृत्व कर रहे थे? जरा सोचिए कि हमने आजादी के वर्षों बाद क्रांति वीर ,धरती पुत्र, प्रकृति के सच्चे प्रहरी सरदार विष्णु सिंह जी क्रांतिकारी के साथ क्या न्याय किया है? अफसोस होता है जिस संसद में 20 वर्षों से आदिवासी वनवासी बंधुओं को प्रतिनिधित्व मिला हुआ है, वहां जन प्रतिनिधियो की आवाज तालाब में फैली जलकुंभी के लिए उठती है , जिसने तालाब को जड़क लिया था और जिसको हटाने के लिए किये प्रयासों को प्रमाणिकता मिल सके ताकि सम्मानों के लिए फ़ाइलों का प्रबंधन सुनिश्चित हो सके ,लेकिन लोकतंत्र के मंदिर में उन आदिवासी वनवासी बंधुओं के जंगल सत्याग्रह की आवाज आज तक गुंजित नहीं हुई, जिन्होंने प्राणों की बाजी लगाकर भारत मां को जल कुंभी रूपी जकड़ी हुई गुलामी की बेला से हमेशा हमेशा के लिए मुक्ति दिलवाई।

 क्रांतिकारी विष्णु सिंह जी को फांसी के फंदे से नीचे उतारकर लाने वाले अंग्रेजों के खिलाफ प्रिवी काउंसिल में अपना सब कुछ बेचकर जीवन लगा देने वाले आंबेकर शास्त्री जी के हिस्से क्या आया! जिस फांसी के फंदे पर चढ़ा लेने के लिए क्रांति वीर सरदार विष्णु सिंह जी की पूरी तैयारी कर ली गई थी, यह कोई फिल्मी दृश्य नहीं , हकीकत है, आदेश आता है कि सरदार विष्णु सिंह जी की फांसी की सजा माफ कर दी गई है और उन्हें 29 वर्ष का कठोर आजन्म कारावास की सजा सुनाई जाती है ? जिन्हें चंद घंटों में फांसी होनी थी, आंबेकर शास्त्री जी के प्रयास फांसी आजन्म कारावास में तब्दील हो जाती हैं।

 क्रांतिकारी सरदार विष्णु सिंह जी है का सम्मान बस स्टैंड के नाम में सिमट दिया गया, और जिन स्वतंत्रता संग्राम सैनानी शास्त्री जी ने सब कुछ बेचकर निश्चित हो रही फांसी को रुकवाकर क्रांतिवीर सरदार विष्णु सिंह जी का जीवन बचा लिया उन अंबेकर शास्त्री जी के हिस्से चौक सड़क के नाम दिए जा रहे ज्ञापन और जन प्रतिनिधियो, अधिकारियों, समाज की झूठी घोषणाओ में सिमट कर रख दिया। हम चौक पर भगवान के उस फरसे को लगाने के लिए तैयार हो गए , जिस भगवान से जीवन मिलता है लेकिन हम उस महामानव की गाथा को भूला बैठे जिसके अथक प्रयास परिश्रम से एक इंसान क्रांतिकारी को जीवन का अभयदान मिल जाता है ।भारत मां के क्रांति के सूत्रपात क्रांतिकारियों, स्वतंत्रता संग्राम

सैनानियो ,क्रांतिकारियों के उस फरसे की गाथा को भूला बैठे जिनके त्याग समर्पण तपस्या बलिदान कारण आज हम आजाद भारत में सांस ले पा रहे है।

नोट _किसी के प्रति असम्मान नहीं है, न ही किए कार्यों के प्रति असम्मान है बल्कि हम उनके किये कार्यों और सम्मान पर गर्व करते हैं,लेकिन क्रांतिवीर सरदार विष्णु सिंह, आंबेकर शास्त्री जी को उनके व्यक्तित्व और बलिदान को उचित सम्मान मिल सके।

हेमंत चंद्र दुबे बबलू बैतूल

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