आज सारा विश्व शांति स्वरूपा सीता को खोजने में लगा है: पं निर्मल कुमार शुक्ल।।

श्री हनुमत कथा महोत्सव चतुर्थ दिवस ।

बैतूल। भगवान शंकराचार्य ने अपने विवेक चूड़ामणि ग्रंथ में लिखा है कि शांति सीता समानीता आत्मा रामो विराजते। तात्पर्य यह कि हमारे जीवन में भगवान श्री राम आत्मा और सीता जी शांति के रूप में विराजमान हैं। आज सारा संसार उन्ही शांति रूपा सीता को खोजने में व्यस्त है। एक विद्वान उन्हें विद्या के रूप में तो एक भक्त उन्हें भक्ति के रूप में एक साधक उन्हें सिद्धि के रूप में तो एक व्यापारी लक्ष्मी के रूप में पाना चाहता है।सीता माता मुक्ति और कीर्ति के रूप में सबको चाहिए। दुर्गा सप्तशती में जगदंबा के इन सब स्वरूपों की विस्तार से चर्चा की गई है। हमारे जीवन की समस्या यह है कि हम लोभ के वशीभूत होकर उन्हें अपने से दूर कर चुके हैं । रामायण में बड़ी आध्यात्मिक व्याख्या है एक दिन भगवान श्रीराम की कुटी के समीप एक स्वर्ण का मृग आया और सीता जी की दृष्टि उस पर पड़ गई शास्त्रों में सोने को लोभ का स्वरूप कहा गया है।बस सीता जी आकर्षित हो गईं वैसे भी व्यवहार में स्त्री का आकर्षण स्वर्ण के प्रति होता ही है ।बस सीता जी ने श्री राम को उस स्वर्ण मृग के पीछे भेज दिया। यद्यपि श्री राम सब जानते थे किन्तु लीला विस्तार के लिए लक्ष्मण को सीता की सुरक्षा में रखकर वो चले गये।जब राम ने मृग पर वाण चलाया तो मृत्यु के पहले उसने राम के स्वर में हा लक्ष्मण की आवाज लगाते हुए प्राण त्याग दिया।उधर जब सीता ने राम के स्वर में यह करुण पुकार सुना तो लक्ष्मण को जबरन भेज दिया आध्यात्मिक दृष्टि से श्री और लक्ष्मण ज्ञान तथा वैराग्य हैं सीता ने पहले लोभ के पीछे ज्ञान भेज दिया पीछे से वैराग्य को भी दूर कर दिया।जब हमारे जीवन से ज्ञान वैराग्य दूर चले जाते हैं तो परिणाम स्वरूप मोह रूपी रावण का आगमन होता है। रावण ही मोह है। मोह दशमौलि तद्भ्रात अहंकार पाकारि जित काम विश्राम हारी।इस प्रकार रावण मोह कुंभकर्ण अहंकार और मेघनाद काम का स्वरूप है। रावण ने सीता को मोह नगर लंका की अशोक वाटिका में कैद कर दिया।इधर भगवान श्री राम ने हनुमान जी को वानरों के साथ सीता को खोजने के लिए भेजा।ए सारे वानर खोजते खोजते सौ योजन के समुद्र के किनारे पहुंच गए।हमारा देहाभिमान ही सागर है संपाती ने बताया कि सौ योजन समुद्र के पार अशोक वाटिका में सीता बैठी हैं जो इस महासागर को पार करेगा उसे ही उनका दर्शन प्राप्त होगा।सारे वानरों ने अपने अपने बल का वर्णन किया किंतु सौ योजन सागर पार करने में कोई समर्थ नहीं हो सका।अंत में जांबवान ने हनुमान जी को जगाया। समुद्र के किनारे इन वानरों के रूप में भूत भविष्य और वर्तमान तीनों काल एकत्र हैं। जांबवान पूर्व में बहुत शक्तिशाली थे किन्तु ए वृद्ध हो चुके हैं इनका यौवन समाप्त हो चुका है याने ए भूत काल हैं। युवराज अंगद भी लंका जाएंगे लेकिन बाद में इस समय ए तैयार नहीं हैं याने ए भविष्य काल हैं वर्तमान के स्वरूप में हनुमान जी विराजमान हैं।अंत में भूतकाल जांबवान ने वर्तमान काल हनुमान जी को जगाना प्रारंभ कर दिया।कहां रीक्षपति सुनु हनुमाना।का चुप साधि रहा बलवाना।पवन तनय बल पवन समाना।बुधि विवेक विज्ञान निधाना आदि आदि। अंत में हनुमान जी जागृत हुए उनकी घन गर्जना से दशों दिशाएं कंपित हो गईं पर्वताकार शरीर धारण करके हनुमान जी लंका जाने को प्रस्तुत हो गये। गोस्वामी जी ने यहां हनुमान जी की गति का वर्णन करते हुए कहा जिमि अमोघ रघुपति कर बाना।एही भांति चला हनुमाना। जैसे राम का वाण जाता है उसी प्रकार हनुमान जी चले। यहां राम के वाण की उपमा हनुमान से देना बड़ा गंभीर चिंतन है। राम के वाण में 5 विशेषताएं हैं वहीं विशेषताएं हनुमान जी में भी हैं। पहली विषेषता राम का वाण जीव को मुक्त कर देता है तो हनुमान भी जिसे मिल गये वो मुक्त ही हो जाता है।दूसरी विशेषता राम के वाण में प्रत्यावर्तन है वो काम करके वापस आ जाते हैं तो यही विशेषता हनुमान की भी है तीसरी विषेषता अनेकता है राम के वाण धनुष से छूटते हैं अनेक हो जाते हैं तो हनुमान भी अनेक अनेक रूप धारण करके सर्वव्यापी रूप में राम भक्तों की रक्षा में तत्पर रहते हैं। राम वाण की चौथी विषेषता है अमोघता याने ए कासी से काटे नहीं जा सकते तो हनुमान भी अमोघ हैं इन्हें काटा नहीं जा सकता पांचवीं विशेषता अचूकता ए वांण सीधे अपने लक्ष्य पर लगते हैं तो उसी प्रकार हनुमान भी लक्ष्य से भटकते नहीं।न्यू बैतूल स्कूल ग्राउंड कमानी गेट में मानस महारथी पं निर्मल कुमार जी शुक्ल ने श्री हनुमत कथा महोत्सव के चतुर्थ दिवस उक्त उद्गार व्यक्त किया।विशाल श्रोता समूह को भाव विभोर करते हुए आपने रामायण के विभिन्न प्रसंगों का मार्मिक वर्णन किया। आयोजक राजेश अवस्थी और संगीता अवस्थी ने नगर एवं क्षेत्र के समस्त धर्म प्रेमी श्रद्धालुओं से अधिकाधिक संख्या में पधारकर कथामृत पान करने का आग्रह किया है यह कथा गंगा प्रतिदिन दोपहर 3 से 6 बजे तक प्रतिदिन प्रवाहित होगी।राम नवमी दि 27 मार्च को कथा का विश्राम होगा।

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