बाबूलाल जी भगत के मानवता इंसानियत के लिए किये भागीरथी प्रयास पद्म सम्मानों से क्यों दूर है?
इस देश में सम्मान दिए नहीं बांटे और लिए जाते है भाग _8

एक विचार _सच्चाई के करीब
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4 फरवरी विश्व कैंसर दिवस पर विशेष
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एक व्यक्ति जिसने पचास वर्षों से अधिक समय निरंतर अनवरत इंसानियत मानवता की सेवा करते हुए न जाने कितने कैंसर पीड़ित परिवारों के चेहरों पर जीवन की खुशी, ओंठ पर मुस्कान लौटाकर दी है। नाम है बाबूलाल भगत। प्रकृति से जितना दूर हम जाते है कैंसर को उतना ही समीप पाते है। बाबूलाल जी जल जंगल जमीन से प्रकृति के साथ जुड़कर कैंसर पीड़ितों की वर्षों से निस्वार्थ भाव से सेवा कर रहे है। बस उनका कोई फाइव स्टार हॉस्पिटल नहीं है, कोई वैज्ञानिक रिसर्च नहीं है, ओपीडी रजिस्टर नहीं है जिसमें वे मरीजों के नाम पते लिख सकते, न ही उनके पास कोई रजिस्ट्रेशन नहीं है इसलिए वे भारत मे मिलने वाले सम्मानों से कोसों दूर खड़े हैं। वे भी यदि कैंसर पीड़ित के आंखों से छलकते आंसुओं को दर्द को छोटी छोटी शीशियों में भरकर , सूची बनाकर सरकार के नुमाइंदों तक पहुंचा देते तो बाबूलाल जी भी आज सम्मान के हकदार हो जाते। प्रकृति के वरदान से मिली जड़ी बूटियों से उपचार किया जाता हैं हजारों पीड़ितों को यदि उससे लाभ होता है और जो प्रामाणिकता के साथ ठीक हो सामान्य जीवन जीने लगते है तो फिर क्या हमे किसी और प्रमाण की आवश्यकता महसूस होनी चाहिए? हनुमान जी, लक्ष्मण जी के लिए पर्वत उठाकर संजीवनी बूटी ले आये और लक्ष्मण जी की मूर्च्छा पल भर में गायब हो गई, किसीने आज तक उस घटना का कोई वैज्ञानिक रिसर्च का प्रतिवेदन या प्रमाण मांगा, नहीं। सिर्फ प्रमाणिकता के साथ दावा किया गया, लिखने वालो ने ईमानदारी नैतिकता से घटना का वर्णन किया, लक्ष्मण जी को पुनः युद्ध के मैदान में इंद्रजीत से युद्ध करने का प्रामाणिक वर्णन का वृतांत सुना और पढ़ा और आज भी पूरा संसार उस घटना को और लक्ष्मण जी के किए उस उपचार पर विश्वास करता है, फिर आज हम जड़ी बूटियों से होते उपचार पर इतने प्रश्न चिन्ह क्यों खड़े करते हैं? और यदि बाबूलाल जी की जड़ी बूटियों का यदि कोई वैज्ञानिक आधार ढूंढा जाना चाहिए तो इतने वर्षों में रिसर्च करी और कराई जा सकती थी, कौन ने रोका था? लेकिन ऐसा प्रयास नहीं किया गया, क्योंकि व्यवसाय की दुनिया यह बात अच्छे से समझती हैं कि प्रकृति से कैंसर का उपचार ढूंढ लिया गया तो बजट में कैंसर की दवाइयों की कीमतें कम करने की नौटंकी को बंद करना होगा।
आज बाबूलाल जी केवल इंसानियत मानवता की सेवा ही नहीं कर रहे है, बल्कि मानवता के लिए जंगल को भी बचा रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि मेरे जंगल बचेंगे तो ही मेरी जड़ी बूटियां बच पाएंगी और जब जड़ी बूटियां बचेगी तो मानवता इंसानियत की सेवा हो सकेगी। बाबूलाल जी की जड़ी बूटी इस देश में सरकारों की मान्यताओं से इसलिए दूर है कि वे उसका कोई मूल्य नहीं लेते क्योंकि प्रकृति से प्रेम करने वाले बाबूलाल जी को पता है कि जीवन अमूल्य है इसलिए मूल्यवान जड़ी बूटियों का कोई मूल्य नहीं रखा गया इसलिए वह भारत सरकार के बजट का हिस्सा भी नहीं और बाबूलाल जी सम्मान के हकदार भी नहीं हो सके, वहीं सरकार पता नहीं कितने वर्षों से कैंसर की दवाइयों की कीमतें कम कर रही हैं पर वह आज तक कम नहीं हो सकी है, कैंसर से राजस्व कमाने वाली मेरी देश की सरकारें सच पूछा जाएं तो मानवता इंसानियत की हत्यारी है, जो अनेकों वर्षों से देश में राजस्व अर्जित करने के लिए पर्दे के पीछे से अपनी नीतियों से कैंसर को दिन दुना रात चौगुना वृद्धि करवा रही हैं, ताकि राजस्व से सरकार का खजाना भर सके, कैंसर कारणों के रोकथाम पर बजट में कोई प्रावधान नहीं करेंगे, कैंसर की दवाइयों को सस्ता करने का नाटक करती है,वही बाबूलाल भगत बिना शुल्क लिए कैंसर पीड़ितों की पिछले अनेक वर्षों से सेवा कर रहे है लेकिन वे सरकार की, जन प्रतिनिधियो की, अधिकरियों की नजरों से केवल इसलिए दूर है क्योंकि वे जंगल में प्रकृति के साथ जुड़कर मानवता इंसानियत की सेवा कर रहे हैं, यदि वे भी कोई ट्रस्ट बना लेते, यदि वे भी कोई सरकारी अनुदान लेने लगते, यदि वे भी जन प्रतिनिधियो की आँखों के तारे हो जाते तो आज बाबूलाल जी भी सम्मान के हकदार हो जाते,अब न तो बाबूलाल जी किसी को टिकिट दिलवा सकते है न ही चुनावों में प्रचार कर सकते है तो फिर वे कैसे किसी सम्मान के हकदार हो सकते है? 4 फरवरी विश्व कैंसर दिवस है यदि हम प्रकृति से निकटता बनाएं हम अपने जीवन को प्रकृति धरती नदी से जोड़े, बाबूलाल जी भगत के संदेश को समझे कि कैंसर का उपचार भी प्रकृति से है और कैंसर की रोकथाम भी प्रकृति पर निर्भर है तो हम 4 फरवरी को विश्व कैंसर दिवस नहीं विश्व कैंसर मुक्त दिवस मना सकते है, लेकिन सरकारी तंत्र व्यापार की दुनिया ऐसा होने नहीं देती हैं और इसलिए बाबूलाल जी सम्मान से दूर दिखते है क्योंकि उनकी सोच प्रकृति को बचाने की सोच है जिससे वे मानवता इंसानियत की सेवा कर पाते है। काश वे भी किसी संगठन, संस्था किसी अवतरण अभियान से जुड़े होते तो सम्मान पा जाते, लेकिन बाबूलाल जी तो भागीरथ है जो इंसानियत मानवता के लिए तपस्या कर रहे है, अब जब इस देश में गंगा को धरती पर अवतरित करने वाले तपस्वी भगीरथ सम्मान नहीं पा सके तो आधुनिक युग के भगीरथ बाबूलाल जी इस देश में कैसे सम्मान पा सकते है कोई मुझे समझाए इस देश में गंगा की आरती तो है पर उस मां को घोर तपस्या करके धरती पर लाने वाले भागीरथ की कोई आरती और मंदिर हो तो अवश्य बताइए। इस देश में जो प्रकृति के लिए मानवता, इंसानियत, देश के लिए , भारत मां के लिए तपस्या करते है वे सम्मान से दूर है और इसलिए इस देश में सम्मान दिए नहीं बांटे और लिए जाते हैं ,लेकिन ऐसी अनेकों विभूतियों को सम्मानित भी किया गया है जो हमे जीवन में प्रेरणा देती हैं , जिन पर हमें गर्व है, उनकी योग्यता विद्वता समर्पण पर हम उंगली नहीं उठा सकते है बस प्रश्न इतना सा कि धरती पर घोर तपस्या से गंगा को अवतरित करने वाले भागीरथ के साथ अन्याय क्यों है? जैसे बाबूलाल जी भगत।
विचार की श्रृंखला निरन्तर जारी रहेगी ___________________
हेमंत चंद्र दुबे बबलू बैतूल




