नर्मदापुरम संभाग में 3.4 लाख हेक्टेयर से अधिक जमीन पर आदिवासियों का अधिकार, जयस ने रखे आंकड़े। 5वीं अनुसूची के पालन को लेकर राज्यपाल से मांगा त्यागपत्र, कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन।
76 वर्षों से आदिवासी अधिकारों की अनदेखी का आरोप, राजभवन घेराव की चेतावनी । रानी दुर्गावती ऑडिटोरियम में सभा के बाद रैली निकाल कलेक्ट्रेट पहुंचे सैकड़ों आदिवासी । 5वीं अनुसूची के पालन की मांग करते हुए राज्यपाल के नाम सौंपा ज्ञापन।

बैतूल। जय आदिवासी युवा शक्ति संगठन जयस ने बुधवार 11 मार्च को रानी दुर्गावती ऑडिटोरियम में आदिवासी अधिकारों के मुद्दे पर विशाल सभा आयोजित की। सभा के बाद सैकड़ों आदिवासी रैली निकालते हुए कलेक्ट्रेट पहुंचे और राज्यपाल के नाम कलेक्टर बैतूल को ज्ञापन सौंपकर संविधान की 5वीं अनुसूची के पालन की मांग की। मध्य प्रदेश के राज्यपाल की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाते हुए आदिवासी हितों में कार्यवाही नहीं होने पर त्यागपत्र की मांग की। संगठन का कहना है कि 26 जनवरी 1950 से लागू संविधान की 5वीं अनुसूची के बावजूद आदिवासी समाज के संसाधनों और भूमि अधिकारों की सुरक्षा के लिए राज्यपाल द्वारा कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए गए।
ज्ञापन में कहा गया कि संविधान की 5वीं अनुसूची की धारा 5 के तहत आदिवासी भूमि और संसाधनों की रक्षा की जिम्मेदारी राज्यपाल पर है, लेकिन इसके बावजूद आदिवासियों को जमीन से बेदखल किया जा रहा है और उनके अधिकारों को राजपत्र में प्रकाशित आदेशों के माध्यम से सीमित किया जा रहा है। जनवरी 2008 से लागू वन अधिकार कानून के तहत वनग्रामों के पटवारी मानचित्र, खसरा पंजी, निस्तार पत्रक और अतिक्रमण पंजी की प्रतियां ग्रामवासियों को दिए बिना दावे आमंत्रित कर उन्हें मान्य और अमान्य किया गया, जिसे राज्य स्तरीय वनाधिकार समिति और टास्कफोर्स द्वारा रोके जाने के बजाय संरक्षित किया गया।
संगठन ने आरोप लगाया कि वनग्रामों के पटवारी मानचित्र में दर्ज चान्दे और गिरीं के आधार पर सीमांकन करने के बजाय मनमाने तरीके से मुनारे बनाकर पट्टे की भूमि को वन भूमि बताकर वन अपराध दर्ज करने और जप्ती की कार्रवाई की जा रही है। वहीं 16 अप्रैल 2015 को आदिवासी विकास आयुक्त द्वारा सामुदायिक वन अधिकारों को मान्यता देने संबंधी आदेश के बावजूद नर्मदापुरम संभाग के आयुक्त और कलेक्टर ने धारा 5 से 19 तक की जांच कर समाज को अधिकार देने के बजाय जमीनों को आरक्षित वन घोषित करने के आदेश जारी किए।
जय आदिवासी युवा शक्ति के जिला संयोजक राजा धुर्वे ने आरोप लगाया कि बीते 76 वर्षों में आदिवासी समाज को भूमि अधिकार दिलाने या सामुदायिक संसाधनों पर अधिकार देने के लिए राजभवन द्वारा कोई ठोस पहल नहीं की गई, जो संविधान की अवमानना है। संगठन ने यह भी स्पष्ट करने की मांग की कि वनग्रामों के 1980-81 के पटवारी मानचित्र के आधार पर सीमांकन होगा या आईएफएस अधिकारी मनोज अग्रवाल के निर्देशों के अनुसार कार्यवाही की जाएगी।
संगठन ने राज्यपाल से तत्काल हस्तक्षेप की मांग करते हुए चेतावनी दी कि यदि संविधान की 5वीं अनुसूची के अनुसार कार्यवाही नहीं हुई तो राजभवन के घेराव का आंदोलन किया जाएगा। ज्ञापन सौंपने के दौरान जिला अध्यक्ष संदीप कुमार धुर्वे, राजा धुर्वे और महेश उइके के नेतृत्व में सैकड़ों आदिवासी उपस्थित रहे।
– जिले और संभाग के आंकड़े किए प्रस्तुत
संगठन ने इस संबंध में जिले और संभाग के आंकड़े भी प्रस्तुत कर प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठाए।
जयस के अनुसार हरदा जिले में कुल 527 ग्राम हैं, जिनमें 42 वनग्राम और 77 राजस्व ग्राम शामिल हैं। नर्मदापुरम संभाग में कुल 936 ग्राम और बैतूल क्षेत्र में 1303 ग्राम दर्ज हैं। ज्ञापन में बताया गया कि हरदा में 491 वन अधिकार समितियां गठित हैं, जबकि नर्मदापुरम में 140 और बैतूल क्षेत्र में 1144 समितियां हैं।
संगठन ने निस्तार पत्रक और भूमि रिकॉर्ड का हवाला देते हुए बताया कि निस्तार पत्रक में हरदा जिले में 55 हजार 872 हेक्टेयर से अधिक भूमि दर्ज है, जबकि नर्मदापुरम में 1 लाख 37 हजार 486 हेक्टेयर और बैतूल क्षेत्र में 2 लाख 9 हजार 418 हेक्टेयर से अधिक भूमि दर्ज है। इसके अलावा खेतों की भूमि, आबादी क्षेत्र, चरनोई, पहाड़, जंगल और पान की भूमि जैसे पारंपरिक संसाधनों का भी उल्लेख करते हुए कहा गया कि इन पर आदिवासी समाज का पारंपरिक अधिकार रहा है।
जयस का आरोप है कि वन अधिकार कानून 2006 की धारा 3(1) और संबंधित प्रावधानों के बावजूद इन संसाधनों पर आदिवासी समाज को अधिकार और प्रबंधन नहीं दिया जा रहा। संगठन ने मांग की है कि सामुदायिक वन अधिकारों को तत्काल मान्यता दी जाए और संविधान की 5वीं अनुसूची के प्रावधानों के अनुसार आदिवासी समाज को उनके पारंपरिक संसाधनों पर अधिकार सौंपे जाएं।




