चेक बाउंस मामलों में 30 दिन में नोटिस और 15 दिन में भुगतान जरूरी: अधिवक्ता भारत सेन।
इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से समन और नोटिस भेजना अब अनिवार्य, मोबाइल-ईमेल देना होगा । तकनीकी गलती या गलत पते पर नोटिस भेजने से पूरा मामला हो सकता है निरस्त।

बैतूल। चेक बाउंस के बढ़ते मामलों के बीच सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने मांग सूचना पत्र को लेकर नई स्पष्टता और सख्ती ला दी है। अधिवक्ता भारत सेन ने बताया कि 25 सितंबर 2025 को आए फैसले में कोर्ट ने कहा है कि यदि आरोपी मांग सूचना पत्र का जवाब नहीं देता है तो इसे उसके खिलाफ एक महत्वपूर्ण परिस्थिति माना जाएगा, जिससे शिकायतकर्ता का पक्ष मजबूत होता है।
कानून के अनुसार चेक बाउंस होने पर शिकायतकर्ता को बैंक से अनादरण की जानकारी मिलने के 30 दिन के भीतर लिखित मांग सूचना पत्र भेजना अनिवार्य है। यह नोटिस रजिस्टर्ड पोस्ट, स्पीड पोस्ट या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम जैसे ईमेल और व्हाट्सएप से भी भेजा जा सकता है। नोटिस में चेक का पूरा विवरण, बाउंस का कारण और 15 दिन के भीतर भुगतान की स्पष्ट मांग करना जरूरी है।
यदि नोटिस मिलने के बाद 15 दिन में भुगतान नहीं होता तो कारण कार्रवाई उत्पन्न होती है और इसके एक महीने के भीतर न्यायालय में परिवाद दायर करना होता है। नए निर्देशों के अनुसार अब शिकायत के साथ आरोपी का मोबाइल नंबर, ईमेल और व्हाट्सएप विवरण देना भी जरूरी कर दिया गया है ताकि समन इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भेजे जा सकें।
– मांग सूचना पत्र को शिकायत दायर करने की अनिवार्य शर्त
मांग सूचना पत्र को शिकायत दायर करने की अनिवार्य शर्त माना गया है। बिना वैध नोटिस के अदालत परिवाद स्वीकार नहीं करती। यह आरोपी को भुगतान का अंतिम अवसर देता है और जवाब न देने की स्थिति में धारा 139 के तहत शिकायतकर्ता के पक्ष में प्रेजम्प्शन और मजबूत हो जाता है।
नोटिस तैयार करते समय सही पता, स्पष्ट भाषा, सही राशि और सभी संबंधित पक्षों को भेजना आवश्यक है। पोस्ट रसीद, एडी कार्ड या डिजिटल डिलीवरी का प्रमाण सुरक्षित रखना भी जरूरी है। 30 दिन की समय सीमा पार करने या गलत पते पर नोटिस भेजने जैसी त्रुटियों से पूरा मामला खारिज हो सकता है।
– सजा से अधिक भुगतान सुनिश्चित करना है उद्देश्य
आरोपी के लिए नोटिस का जवाब देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इससे उसे अपना पक्ष रखने, समझौते का प्रयास करने और कोर्ट में बचाव मजबूत करने का अवसर मिलता है। जवाब न देने पर उसके खिलाफ प्रतिकूल धारणा बनती है, जिससे सजा की संभावना बढ़ सकती है।
यदि नोटिस विधिसम्मत नहीं है, समय सीमा का पालन नहीं हुआ या परिवाद निर्धारित समय में दायर नहीं किया गया तो मामला निरस्त किया जा सकता है। ऐसे में आरोपी उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर राहत ले सकता है।
अधिवक्ता भारत सेन के अनुसार चेक बाउंस मामला आपराधिक जरूर है, लेकिन इसका उद्देश्य सजा से अधिक भुगतान सुनिश्चित करना है। इसलिए शिकायतकर्ता और आरोपी दोनों को मांग सूचना पत्र को गंभीरता से लेते हुए कानूनी प्रक्रिया का सही पालन करना चाहिए।




