Holi news: शिवरात्रि मनाने के बाद शुरू होती है आदिवासी समाज की विशेष होली शिमगा
15 दिन तक लकड़ी, कंडा जमा करने के बाद बनाई जाती है होली

महिलाए गोंडी गीत गाते हुए पुरुषों से मांगती है फगवा बैतूल। आदिवासी जनजाति गोंड, परधान, गोंड गायकी समाज में शिमगा याने होली का त्यौहार शिवरात्रि (शम्भू नरका) मनाने के बाद होली मनाने की शुरुआत हो जाती हैं। आदिवासी समाज के भगत भभु धुर्वे गुम्मूढाना और सामाजिक कार्यकर्ता जितेंद्र सिंह इवने ने बताया कि आदिवासी समाज के लोग अपने-अपने कुटुंब व परिवार के साथ आदिवासियों के आराध्य शम्भू की पूजा करने शम्भू देवस्थान (पेनठाना) जाते हैं। बैतूल जिले के आदिवासी समाज के लोग प्रायः पचमढ़ी, छोटा महादेव भोपाली, सालबर्डी, मढ़देव असाडी, डुलाहरा बिघवा एवं अन्य शम्भू देव स्थान जाते हैं। आदिवासी समाज के लोग माह महीने की पूर्णिमा से शिवरात्रि तक शम्भू के लिए जागरण करते हैं। पूरे परिवार कुटुंब के साथ पहले शम्भू की पूजा करते हैं और रात्रि विश्राम में शम्भू जागरण व उनकी उपासना करते हैं। दूसरे दिन पूरे परिवार के लोग सामुहिक भोजन करने के बाद विष की होली जलाते हैं, होली की पांच परिक्रमा करते हुए शम्भू गवरा सेवा सेवा कहते है और होली की राख व गुलाल लगाकर एक दूसरे से सेवा सेवा कहकर गले मिलकर होली मनाते है, उसके बाद आदिवासी समाज की महिलाए गोंडी गीत गाते हुए पुरुषों से फगवा मांगती हैं। उसके बाद सभी लोग वापस गांव आ जाते हैं। आदिवासी समाज के लोग शिवरात्रि के दो, तीन दिन बाद फागुन चांद दिखने पर नया वर्ष मनाते हैं। फागुन चांद दिखने पर घरों में एक दूसरे को नए साल की शुभकामनाएं देते हैं। आदिवासी समाज में फागुन का महीना नए वर्ष का पहला माह होता हैं। हर गांव में फागुन चांद दिखने के 15 दिन तक लकड़ी कंडा जमा करते हैं ओर उसकी होली बनाई जाती हैं। उसके बाद फागुन महीने के पूर्णिमा (पूंनो) में सभी गांवों में होली जलाई जाती हैं जिसे आदिवासी समाज मे शिमगा कहते हैं। उसके बाद जिस गांव में खंडेराय होते है वह पर खंडेराय मेला लगता हैं, जिसे आमतौर पर मेघनाद मेला कहते हैं।




