जाने से पहले पांच रूपये मे खरीदी मित्र की 48 साल से संभाल कर रखी लाठी सौपी ।

ग्राम रोंढ़ा के मनोहरी डिगरसे एवं स्वर्गीय मंहग्या भोभाट की बेमिसाल दोस्ती की कहानी ।

बैतूल। उनकी मित्रता न तो सुदामा – कृष्ण की तरह थी और न ही वे दुर्योधन – कर्ण की तरह वचनबद्ध थे। अशिक्षित लेकिन गांव दो मेहनती मजदूर किसान जब तक साथ रहे एक दुसरे के सुख – दुख के सहभागी बने रहे। बीते लगभग पांच दशक पूर्व हम उम्र के दो एक स्वजातिय मनोहरी एवं मंहग्या की दोस्ती आज के दौर में चहुंओर चर्चा का केन्द्र बनी हुई है। मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य बैतूल जिले में धारा नगरी (वर्तमान धार) से आकर बसे पंवार जाति के लोगो की बसाहट का केन्द्र बने आज का रोंढ़ा किसी जमाने में शिक्षा के लिए नालंदा या तक्षशीला से कम नहीं था। गांव में दूर – दूर से आसपास के गांव के लोग पढऩे आया करते थे। बैतूल जिला मुख्यालय से मात्र 9 किमी की दूरी पर बसे रोंढ़ा को जिले के सबसे प्राचिन गांवो के रूप में पहचान मिली है। यूं तो रोंढ़ा कृषि प्रधान गांव है लेकिन एक समय यह गांव पूर्ण रूप से साक्षर एवं सम्पन्न गांव कहलाता था। वर्तमान में इस गांव की आबादी का आकड़ा दो हजार की संख्या को पार नहीं कर सका है। गांव ने परिवार नियोजन को भले न अपनाया हो लेकिन गांव की जनसंख्या दो हजार के आकड़े से अधिक न ही हो सकी। जिले की 556 ग्राम पंचायतो में से एक रोंढ़ा चारो ओर हरे भरे खेतो से घिरी हुई है। इस गांव में मनोहरी डिगरसे और मंहग्या भोभाट नामक दो मजदूर किसान करते थे। अपने साथियो का एक समूह बना कर ठेके पर कुआं की खुदाई का काम करने वाले मंहग्या पिता स्वर्गीय टुकड्या भोभाट (जाति पंवार) ने 30 सालो तक रोंढ़ा सहित आसपास के दर्जनो कुओं को अपने हाथो के दम पर खोदा एवं उसकी भीतर से चारो ओर से ईट एवं चुना से बंधाई काम किया। अपने सरकारी नौकरी में काम कर रहे बेटो के सहारे दो एकड़ खेतीबाड़ी करने वाले स्वर्गीय मंहग्या जी भोभाट के परदादा स्वर्गीय भिख्या जी महाजन की उसी गांव में कभी 40 बीघा जमीन हुआ करती थी लेकिन मालगुजारी के समय अग्रेंजी शासनकाल में वायदा लगान न चुकाने के कारण उनकी जमीन चली गई। समयकाल के परिवर्तन के कारण ठेका पर कुआ खोदने वाले मंहग्या भोभाट ने अपने एक मित्र को आज से 48 साल पहले मात्र 5 रूपये में एक बांस की लाठी जिसके मत्था पर पीतल का कवर चढ़ा हुआ है उसे गांव के एक व्यक्ति द्वारा चुरा लेने के बाद जब वह उसे मिली तो उसने वह लाठी को अपने ही मित्र को बेच दी थी। वर्ष 1992 में महंग्या जी भोभाट के निधन पूर्व उनसे लगभग 48 साल पहले अपने मित्र मनोहरी डिगरसे श्याम नाम की बांस की वह लाठी 5 रूपये में बेच दी थी। अपने बड़े बेटे के द्वारा बनवा दी गई लाठी को जब तक गांव में मंहग्या भोभाट रहे तब तक लेकर चलते रहे लेकिन एक दिन उनकी लाठी चोरी हो गई। गांव में वर्षाकाल के दौरान गांव के सम्पन्न किसान का खप्परैल का घर छाते समय उसे अपनी लाठी मकान में लगी हुई दिखाई दी, जिस पर उसका नाम लिखा था जिसे पहचाने पर उसे वह लाठी को चुरा ले जाने वाले व्यक्ति को देनी पड़ी।

स्वर्गीय मंहग्या भोभाट=

कैसे बनती थी बांस की लाठी

वर्ष 60 से 70 के दशक में बांस की लाठी के सीधा करने के लिए लोहे की जाली में लाठी को रख कर उसके सीधा होने के बाद इस पर डिजाइन तैयार की जाती हैं। इस डिजाइन को तैयार करने के लिए एक विशेष प्रकार की कलाकारी करनी पडती। लाठी पर पीतल का कवर चढाने के बाद उस नाम लिखा जाता था। सही बांस का चयन कर उसे जंगल से काटकर लाने के बाद धुप में सूखने के लिए छोड़ दिया जाता हैं। कड़ी धूप मे चार से पांच दिन में सूख जाता हैं। बांस के सूखने के बाद इसकी घिसाई एवं सफाई की जाती हैं। ताकि बाद में पकड़ते समय हाथो में फांस व कांटा न लगे। इसकी दो से तीन बार घिसाई की जाती हैं।

पुत्र ने पिता को दी थी लाठी

स्वर्गीय मंहग्या जी भोभाट का ज्येष्ठ पुत्र दयाराम पंवार वन विभाग में नाकेदार के पद पर कार्यरत थे। श्री पंवार ने अपने पिता के को अपने सेवाकाल में बांस की वह लाठी बनवा कर दी थी ताकि उनका बुढ़ापा लाठी टेक कर कट सके। स्वर्गीय मंहग्या जी भोभाट( पंवार) आसपास के बारह गांवो में एक मात्र ऐसे व्यक्तिथे जिसके पास पीतल का कवर चढ़ी स्वंय का नाम लिखी लाठी थी। श्याम लाठी को देखने के बाद हर किसी की नजर उस पर लग जाना स्वभाविक था। पतली सी लेकिन लोहे सी मजबूत इस श्याम लाठी पर सबकी नजर थी, एक बार लाठी क्या चोरी हो गई स्वर्गीय मंहग्या भोभाट ने उसे अपने मित्र को मात्र 5 रूपये बेच दी। आज लगभग 86 की उम्र में पहुंच चुके मनोहरी डिगरसे बताते है कि उस लाठी को जब उन्होने खरीदा था तब उनकी उम्र 40 के लगभग रही होगी। उस लाठी के बारे में स्वर्गीय मंहग्या जी भोभाट की पांचवी पीढ़ी को कुछ भी नहीं पता लेकिन एक दिन गांव के उप सरपंच प्रदीप डिगरसे ने लाठी की तस्वीर और उसकी जानकारी सोशल मीडिया पर पोस्ट की। आज जब उस लाठी को बेचने वाले पिता स्वर्गीय मंहग्या जी भोभाट एवं उस लाठी को बनवाने वाले उनके ज्येष्ठ पुत्र स्वर्गीय दयाराम पंवार सेवानिवृत वनपाल दोनो इस दुनिया में नहीं है लेकिन मनोहरी डिगरसे के पास आज भी वह लाठी मौजूद है। स्वर्गीय मंहग्या जी भोभाट की पांचवी पीढ़ी ने जब लाठी के बारे अपने परिवार की वरिष्ठ सदस्य एवं स्वर्गीय मंहग्या जी भोभाट की पुत्र वधु श्रीमती कसिया बाई स्वर्गीय दयाराम पंवार से जानकारी प्राप्त की तो उन्होने लाठी और उसके बेचने के पीछे की पूरी कहानी बता दी। श्रीमति कसिया बाई पंवार के अनुसार उनके ससुर ने आर्थिक तंगी या पैसे के अभाव में वह लाठी नही बेची.. चोरी हो जाने या गुम हो जाने के डर से उन्होने अपने मित्र को बेच दी थी ताकि वह उस लाठी को संभाल कर रखे।

पांचवी पीढ़ी को मिली लाठी की जानकारी

वर्ष 1992 में देवलोक गमन को चले गए स्वर्गीय मंहग्या भोभाट के बाद उसके ज्येष्ठ पुत्र दयाराम पंवार सेवा निवृत वनपाल भी वर्ष 2022 एवं परसराम पंवार सेवानिवृत आरक्षक मध्यप्रदेश पुलिस 2023 में देवलोक गमन को चले गए। बीते 48 साल से किसी को उनकी श्याम लाठी की जानकारी किसी को नहीं थी लेकिन एक दिन ग्राम पंचायत रोंढ़ा के उप सरपंच प्रदीप डिगरसे द्वारा सोशल मीडिया के माध्यम से स्वर्गीय मंहग्या भोभाट के वंशजों को जानकारी दी गई। जानकारी मिलने के बाद परिवार की पांचवी पीढ़ी की सदस्य सुश्री तृप्ति पंवार अपने दादा (डॉ रामकिशोर दयाराम पंवार) के संग अपने दादा के दादा (स्वर्गीय मंहग्या जी भोभाट) की लाठी को वापस लेने के लिए मनोहरी डिगरसे के पास पहुंची, तब उन्होने दो टूक शब्दो में उसे वापस देने या बेचने से मना कर दिया लेकिन यह जरूर कहा कि मेरे भाई की पांच रूपये की यह लाठी मेरे मरने के बाद आपके परिवार को ही मिल जाएगी। इस वर्ष २०२६ के अप्रेल माह दुसरे सप्ताह में अचानक स्वर्गीय मंहग्या भोभाट की गांव में बिहाई नवासी श्रीमति सुषुम दीलिप पंवार के माध्यम से यह संदेश आया कि मनोहरी डिगरसे अपने मित्र की लाठी को अपने निधन के पूर्व ही अपने मित्र स्वर्गीय मंहग्या जी भोभाट के परिजनो को सौपना चाहते है। खबर मिलते ही स्वर्गीय मंहग्या जी भोभाट के सुपौत्र जाने माले लेखक एवं पत्रकार डॉ रामकिशोर दयाराम पंवार रोंढ़ावाला उस लाठी को लेने पहुंचे। श्री पंवार को लाठी सौपते हुए मनोहरी डिगरसे की आंखे भर आई। गांव के लोगो को ऐसा लगा कि पंाच रूपये की लाठी कक की कीमत लगभग पचास साल बाद पांच हजार से पचास हजार तक जाएगी लेकिन मनोहरी डिगरसे ने साफ शब्दो में कहा कि वह लाठी नहीं बेच रहा है बल्कि मित्र की निशानी दे रहा है। बार – बार मना करने के बाद भी उनका श्रीफल एवं सम्मान जनक राशी से सम्मान करते हुए डॉ रामकिशोर दयाराम पंवार ने उनके चरण स्पर्श कर उनका आर्शिवाद प्राप्त किया। गांव में यह किसी रूपहले पर्दे पर दिखाई जाने वाली फिल्मी कहानी की तरह लोगो ने देखी। इधर बैतूल के मालवीय वार्ड खंजनपुर में रहने वाली कु़मारी तृप्ति रोहित पंवार के लिए अब दिन दूर नहीं रहा। अब वह भी अपने दादू के दादू की लाठी को पकड़ कर शान के साथ अपने गांव की ओर चल पड़ेगी।

 

स्वर्गीय मंहग्या जी भोभाट का ज्येष्ठ पुत्र दयाराम पंवार वन विभाग=

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